जब वैदिक साहित्य में प्रभु को निराकार बताया गया है, तो यह समझा जाना चाहिए कि सार्वभौमिक ज्ञान के अनुभव के भीतर उपरोक्त वर्णित सभी रूप प्रभु की पारलौकिक शक्तियों की अलग-अलग प्रदर्शनियाँ हैं, और उनमें से कोई भी वास्तव में प्रभु के पारलौकिक रूप का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। लेकिन जब भगवान वास्तव में पृथ्वी पर या ब्रह्मांड के भीतर कहीं भी उतरते हैं, तो कम बुद्धिमान श्रेणी के लोग भी उन्हें अपने में से एक समझ लेते हैं, और इस प्रकार वे पारलौकिकता की कल्पना निराकार या अवैयक्तिक रूप में करते हैं। वास्तव में, भगवान निराकार नहीं हैं, न ही वे सार्वभौमिक रूपों के भीतर अनुभव किए गए किसी भी बहुरूप के हैं। किसी को भी ब्रह्माजी के निर्देश का पालन करके भगवान के बारे में सच्चाई जानने का प्रयास करना चाहिए।
