श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.6.42 
आद्योऽवतार: पुरुष: परस्य
काल: स्वभाव: सदसन्मनश्च ।
द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि
विराट् स्वराट् स्थास्‍नु चरिष्णु भूम्न: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
कारणार्णवशायी विष्णु परमेश्वर के प्रथम अवतार हैं; वे अनंत काल, आकाश, कार्य-कारण, मन, तत्त्वों, भौतिक अहंकार, प्रकृति के गुणों, इन्द्रियों, भगवान् के विराट रूप, गर्भोदकशायी विष्णु और सभी जीवों (चल और अचल) के स्वामी हैं।
 
Karanarnavasayai Vishnu is the first incarnation of the Supreme Lord. He is the Lord of time, space, cause and effect, mind, elements, physical ego, qualities of nature, senses, the huge form of the Lord, Garbhodakashaayi Vishnu and all movable and immovable creatures.
तात्पर्य
यह तथ्य कि भौतिक सृष्टि स्थायी नहीं है, इस पर पहले ही बहुत बार चर्चा की जा चुकी है। भौतिक सृष्टि सर्वशक्तिमान ईश्वर की भौतिक ऊर्जा का एक अस्थायी प्रदर्शन मात्र है। यह भौतिक अभिव्यक्ति उन सभी सशर्त आत्माओं को एक मौका देने के लिए आवश्यक है जो प्रेममय पारलौकिक सेवा के संबंध में भगवान के साथ जुड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसी अनिच्छुक, सशर्त आत्माओं को आध्यात्मिक अस्तित्व के मुक्त जीवन में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाती है क्योंकि हृदय से वे सेवा करने को तैयार नहीं हैं। इसके बजाय, वे खुद को नकली ईश्वरों के रूप में मानकर आनंद लेना चाहती हैं। सजीव संस्थाएँ संवैधानिक रूप से भगवान के शाश्वत सेवक हैं, लेकिन उनमें से कुछ, अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने के कारण, सेवा नहीं करना चाहते हैं; इसलिए उन्हें भौतिक प्रकृति का आनंद लेने की अनुमति दी जाती है, जिसे माया या भ्रम कहा जाता है। इसे भ्रम इसलिए कहा जाता है क्योंकि माया के चंगुल में फंसे जीव वास्तव में आनंद लेने वाले नहीं होते हैं, हालाँकि वे सोचते हैं कि वे माया द्वारा भ्रमित होकर ऐसा कर रहे हैं। ऐसी भ्रमित सजीव संस्थाओं को समय-समय पर भौतिक प्रकृति के झूठे स्वामी बनने की अपनी विकृत मानसिकता को सुधारने का मौका दिया जाता है, और उन्हें वेदों से सर्वोच्च भगवान कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध के बारे में पाठ पढ़ाया जाता है (वेदईस च सर्वैर अहं एव वेद्यः)। इसलिए भौतिक अभिव्यक्ति की अस्थायी सृष्टि भगवान की भौतिक ऊर्जा का प्रदर्शन है, और पूरे कार्यक्रम को संभालने के लिए सर्वोच्च भगवान स्वयं को कारणार्णवशायी विष्णु के रूप में अवतार लेते हैं जैसे सरकार द्वारा किसी मजिस्ट्रेट को अस्थायी रूप से मामलों का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त किया जाता है। यह कारणोदकशायी विष्णु अपनी भौतिक ऊर्जा (सा एक्षता) को देखकर भौतिक सृष्टि की अभिव्यक्ति का कारण बनते हैं। इस पुस्तक के पहले खंड में हम पहले ही कुछ हद तक जग्रहे पुरुषं रूपम छंद की व्याख्या पर चर्चा कर चुके हैं। भौतिक सृष्टि के भ्रामक खेल की अवधि को कल्प कहा जाता है, और हम पहले ही कल्प के बाद कल्प में होने वाली सृष्टि पर चर्चा कर चुके हैं। उनके अवतार और उनकी शक्तियों की गतिविधियों से, सृजन के पूर्ण तत्व, अर्थात् समय, स्थान, कारण, परिणाम, मन, स्थूल और सूक्ष्म तत्व और उनके अंतःक्रियात्मक प्रकृति के तरीके - अच्छाई, जुनून और अज्ञानता - और फिर इंद्रियाँ और उनका भंडार स्रोत, विशाल ब्रह्मांडीय रूप दूसरे अवतार गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में, और सभी जीवित प्राणी, दोनों चल और खड़े हैं, जो दूसरे अवतार से निकलते हैं, सभी प्रकट हो गए। अंततः, ये सभी रचनात्मक तत्व और स्वयं सृष्टि सर्वोच्च भगवान की शक्तियों की अभिव्यक्तियाँ हैं; सर्वोच्च प्राणी के नियंत्रण से कुछ भी स्वतंत्र नहीं है। भौतिक सृष्टि में यह पहला अवतार, अर्थात् कारणार्णवशायी विष्णु, ईश्वर के मूल व्यक्तित्व का पूर्ण भाग है, श्री कृष्ण, ब्रह्म-संहिता (5.48) में वर्णित अनुसार:

यस्यिका-निश्वसिता-कालमथवलम्ब्य

जीवन्ति लोम-विलाजा जगद-अंडा-नाथाः

विष्णुर महान स इहा यस्य कला-विशेषो

गोविन्दम आदि-पुरुषं तम अहम भजामी

सभी असंख्य ब्रह्मांड केवल महा-विष्णु, या कारणार्णवशायी विष्णु की श्वास लेने की अवधि के दौरान ही बने रहते हैं, जो कि केवल गोविंद का एक पूर्ण भाग है, ईश्वर का मूल व्यक्तित्व प्रभु कृष्ण।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)