भगवान पवित्र हैं और भौतिक क्लेश की सभी गंदगी से मुक्त हैं। वह परम सत्य और पूर्ण ज्ञान का अवतार हैं। वह सर्वव्यापी, बिना शुरुआत और अंत के और अद्वितीय हैं। हे नारद, हे महान ऋषि, महान विचारक उन्हें तभी जान सकते हैं जब वे पूरी तरह से भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं और इंद्रियों की अबाधित परिस्थितियों में शरण लेते हैं। अन्यथा, निराधार तर्कों से, सब कुछ विकृत हो जाता है, और भगवान हमारी दृष्टि से गायब हो जाते हैं।
The Lord is pure and free from all contamination of material suffering. He is the Supreme Truth and is manifested as perfect knowledge. He is omnipresent, beginningless, infinite and non-dual. O Narada, O sage, great sages can know Him only when they are free from all material desires and take refuge in the undisturbed senses. Otherwise everything becomes distorted by vain arguments and the Lord disappears from our sight.
तात्पर्य
यहां अस्थायी, भौतिक रचनाओं में उनकी पारलौकिक गतिविधियों के अलावा भगवान का एक अनुमान है। मायावाद दर्शन भगवान को भौतिक शरीर द्वारा दूषित मानने का प्रयास करता है जब वे अवतार के रूपों को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार के प्रक्षेप को यहां इस स्पष्टीकरण से पूरी तरह से नकार दिया गया है कि भगवान की स्थिति सभी परिस्थितियों में शुद्ध और निर्मल है। मायावाद दर्शन के अनुसार, जब आत्मा अज्ञान से आच्छादित होती है, तो उसे जीव कहा जाता है, लेकिन जब वह इस अज्ञान या अज्ञान से मुक्त हो जाता है, तो वह पूर्ण सत्य के अवैयक्तिक अस्तित्व में विलीन हो जाता है। परंतु यहां कहा गया है कि भगवान सदैव पूर्ण एवं पूर्ण ज्ञान के प्रतीक हैं। यही उनकी विशेषता है: सभी भौतिक कल्मषों से सदैव मुक्ति। यह भगवान को उन व्यक्तिगत, सामान्य जीवित संस्थाओं से अलग करता है जिनमें अज्ञानता के अधीन होने और इस प्रकार भौतिक रूप से नामित होने की क्षमता होती है। वेदों में कहा गया है कि भगवान विज्ञानं आनंदम हैं, आनंद और ज्ञान से भरपूर हैं। बद्ध आत्माओं की तुलना कभी भी उनसे नहीं की जानी चाहिए क्योंकि ऐसी व्यक्तिगत आत्माओं में दूषित होने की प्रवृत्ति होती है। यद्यपि मुक्ति के बाद जीव भगवान के समान अस्तित्व की गुणवत्ता के साथ एक हो सकता है, लेकिन उसकी दूषित होने की प्रवृत्ति, जो कि भगवान के पास कभी नहीं होती, व्यक्तिगत जीव को भगवान से अलग बनाती है। वेदों में कहा गया है, शुद्धम् अपापा-विद्धाम: व्यक्तिगत आत्मा पाप से प्रदूषित हो जाती है, लेकिन भगवान कभी पापों से दूषित नहीं होते हैं। भगवान की तुलना शक्तिशाली सूर्य से की गई है। सूर्य कभी भी किसी संक्रामक वस्तु से दूषित नहीं होता क्योंकि वह बहुत शक्तिशाली है। इसके विपरीत संक्रमित चीजें सूर्य की किरणों से कीटाणुरहित हो जाती हैं। इसी प्रकार, भगवान कभी पापों से दूषित नहीं होते; इसके विपरीत, पापी जीव भगवान के संपर्क से निष्फल हो जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान भी सूर्य की तरह सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार इस श्लोक में प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है। भगवान की शक्ति के विस्तार से कुछ भी बाहर नहीं रखा गया है। ईश्वर हर चीज़ के भीतर है, और वह व्यक्तिगत आत्माओं की गतिविधियों से परेशान हुए बिना, सर्वव्यापी भी है। इसलिए वह अनंत है, और जीव अनंत हैं। वेदों में कहा गया है कि केवल भगवान का ही अस्तित्व है और अन्य सभी का अस्तित्व उसी पर निर्भर है। वह हर किसी की अस्तित्व क्षमता का सृजन करने वाला भंडार है; वह अन्य सभी स्पष्ट सत्यों में सर्वोच्च सत्य है। वह सभी के ऐश्वर्य का स्रोत है, और इसलिए ऐश्वर्य में कोई भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। धन, यश, बल, सौन्दर्य, ज्ञान और त्याग आदि समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण होने के कारण वह निश्चय ही परम पुरुष है। और क्योंकि वह एक व्यक्ति है, उसके पास कई व्यक्तिगत गुण हैं, हालांकि वह भौतिक गुणों से परे है। हम पहले ही इत्थं-भूत-गुणो हरिः (भाग 1.7.10) कथन पर चर्चा कर चुके हैं। उनके दिव्य गुण इतने आकर्षक हैं कि मुक्त आत्माएं भी उनसे आकर्षित हो जाती हैं। यद्यपि वह सभी व्यक्तिगत गुणों से युक्त है, फिर भी वह सर्वशक्तिमान है। इसलिए, व्यक्तिगत रूप से उनका कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि सब कुछ उनकी सर्वशक्तिमान ऊर्जाओं द्वारा किया जा रहा है। इसकी पुष्टि वैदिक मंत्रों से होती है: परस्य शक्तिर विविधैव श्रुयते स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च। इससे उनके विशिष्ट आध्यात्मिक स्वरूप का पता चलता है, जिसे भौतिक इंद्रियों द्वारा कभी भी अनुभव नहीं किया जा सकता है। उसे केवल तभी देखा जा सकता है जब इंद्रियाँ भक्ति सेवा (यम एवैष वृणुते तेन लभ्य:) द्वारा शुद्ध हो जाती हैं। इस प्रकार, कई मामलों में भगवान और जीवों के बीच बुनियादी अंतर हैं। भगवान से किसी की तुलना नहीं की जा सकती, जैसा कि वेदों में कहा गया है (एकम एवाद्वितीयं ब्रह्म, द्वैतद वै भयं भवति)। भगवान का कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है, और उन्हें किसी अन्य प्राणी से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, न ही कोई उनके बराबर हो सकता है। यद्यपि वह अन्य सभी प्राणियों का मूल है, फिर भी उसमें और अन्य प्राणियों के बीच बुनियादी अंतर हैं। अन्यथा पिछले श्लोक में इस कथन की कोई आवश्यकता नहीं होती कि कोई भी उसे सौ प्रतिशत नहीं जान सकता जैसा कि वह है (न यं विदन्ति तत्त्वेन)। उसे कोई भी पूरी तरह से नहीं समझ सकता, यह इस श्लोक में भी बताया गया है, लेकिन कुछ हद तक समझने की योग्यता का उल्लेख यहां किया गया है। केवल प्रशांत, या भगवान के अनन्य भक्त ही उन्हें अधिक हद तक जान सकते हैं। इसका कारण यह है कि भक्तों की अपने जीवन में भगवान के आज्ञाकारी सेवक बनने के अलावा कोई मांग नहीं होती है, जबकि अन्य सभी, अर्थात् अनुभवजन्य दार्शनिक, रहस्यवादी और सकाम कार्यकर्ता, सभी की मूल रूप से कुछ न कुछ मांग होती है, और इस तरह, वे नहीं हो सकते हैं शांत किया. सकाम कार्यकर्ता अपने काम के लिए पुरस्कार चाहता है, रहस्यवादी जीवन की कुछ पूर्णता चाहता है, और अनुभवजन्य दार्शनिक भगवान के अस्तित्व में विलीन होना चाहता है। किसी न किसी तरह, जब तक इंद्रिय संतुष्टि की मांग है, तब तक शांति का कोई मौका नहीं है; इसके विपरीत, अनावश्यक शुष्क काल्पनिक तर्कों से, पूरा मामला विकृत हो जाता है, और इस प्रकार भगवान हमारी समझ से और भी दूर चले जाते हैं। हालाँकि, शुष्क सट्टेबाज, तपस्या और तपस्या के सिद्धांतों का पालन करने के कारण, कुछ हद तक भगवान की अवैयक्तिक विशेषताओं का ज्ञान रख सकते हैं, लेकिन गोविंदा के रूप में उनके परम रूप को समझने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि केवल अमलात्मन, या पूरी तरह से पाप रहित व्यक्ति, भगवान की शुद्ध भक्ति सेवा स्वीकार कर सकते हैं, जैसा कि भगवद गीता (7.28) में पुष्टि की गई है:
येषां टीवी अंत-गतं पापं
जनानां पुण्य-कर्मणाम्।
ते द्वन्द्व-मोह-निर्मुक्ता
भजन्ते माम् दृढ़-व्रतः।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥