श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.6.4 
तद्गात्रं वस्तुसाराणां सौभगस्य च भाजनम् ।
त्वगस्य स्पर्शवायोश्च सर्वमेधस्य चैव हि ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
उनके शरीर की बाहरी सतह हर चीज़ के सक्रिय गुणों और हर तरह के शुभ अवसरों की उत्पत्ति की जगह है। उनकी त्वचा, गतिमान हवा की तरह, सभी प्रकार के स्पर्श की जननी है और सभी प्रकार के यज्ञ करने का स्थान है।
 
The upper surface of his body is the essence of all things and the birthplace of all auspicious occasions. His skin, like moving air, is the source of all kinds of touch and the place for performing all kinds of sacrifices.
तात्पर्य
वायु समस्त ग्रहों की गतिशील शक्ति है, और इस तरह, वेदों के यज्ञ और बलिदान ग्रहों को सशक्त करने के लिए उत्पन्न किए गए केंद्र हैं, वे उनके शरीर की सतह हैं और स्वाभाविक रूप से सभी शुभ अवसरों के उत्स हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)