तच्छ्रद्धधाना मुनयो
ज्ञान-वैराग्य-युक्तया
पश्यन्त्य ात्मनि चात्मानम्
भक्त्या श्रुत-गृहीतया
(भाग. 1.2.12)
निष्कर्ष यह है कि कोई भी ईश्वर को किसी भी विधि से पूरी तरह से नहीं जान सकता, लेकिन उसे सुनने, जप करने आदि की भक्तिमय सेवा प्रक्रिया द्वारा आंशिक रूप से देखा और महसूस किया जा सकता है।
