जब श्री शिव, न तुम और न मैं आध्यात्मिक आनंद की सीमाओं को जान पाए हैं, तो अन्य देवता इसे कैसे जान सकते हैं? क्योंकि हम सभी परमेश्वर की माया से मोहित हैं, इसलिए हम अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार ही इस दृश्यमान संसार को पहचान सकते हैं।
When neither Lord Shiva, nor you, nor I can determine the limits of spiritual bliss, how can other demigods know it? Since we are all enchanted by the illusory power of the Lord, we can perceive this manifested universe only according to our own capacities.
तात्पर्य
हमने कई बार बारह चयनित अधिकारियों (द्वादश-महाजन) के नामों का उल्लेख किया है, जिनमें से ब्रह्मा, नारद और भगवान शिव सर्वोच्च भगवान के बारे में कुछ जानने वालों की योग्यता के क्रम में पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर सूची में शीर्ष पर आते हैं। अन्य देवता, अर्ध-देवता, गंधर्व, चारण, विद्याधर, मनुष्य या असुर सर्वोच्च भगवान, श्री कृष्ण की शक्तियों के बारे में पूरी तरह से नहीं जान सकते। देवता, अर्ध-देवता, गंधर्व, आदि सभी उच्च ग्रहों में अत्यधिक बुद्धिमान व्यक्ति हैं, मनुष्य मध्यवर्ती ग्रहों के निवासी हैं, और असुर निचले ग्रहों के निवासी हैं। उन सभी की परम सत्य की उनकी अपनी अवधारणाएँ और आकलन हैं, जैसे मानव समाज में वैज्ञानिक या अनुभववादी दार्शनिक करते हैं। ऐसी सभी जीवित संस्थाएँ भौतिक प्रकृति के प्राणी हैं, और फलस्वरूप वे भौतिक प्रकृति के तीनों रूपों के अद्भुत प्रदर्शन से चकरा जाते हैं। ऐसी व्याकुलता का वर्णन भगवद्-गीता (7.13) में किया गया है। त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्: ब्रह्मा से लेकर चींटी तक हर प्राणी, व्यक्तिगत रूप से भौतिक प्रकृति के तीनों रूपों, अर्थात् अच्छाई, जुनून और अज्ञानता से चकरा गया है। हर कोई व्यक्तिगत क्षमता के संदर्भ में सोचता है कि यह ब्रह्मांड, जो हमारे सामने प्रकट हुआ है, सब कुछ है। और इसलिए बीसवीं सदी के मानव समाज में वैज्ञानिक अपने तरीके से ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत की गणना करता है। लेकिन वैज्ञानिक क्या जान सकते हैं? एक बार स्वयं ब्रह्मा भी चकरा गए थे, खुद को एकमात्र ब्रह्मा मानकर भगवान ने अनुग्रह किया, लेकिन बाद में, भगवान की कृपा से, उन्हें पता चला कि इस ब्रह्मांड से परे भी कहीं अधिक शक्तिशाली ब्राह्मण हैं, और ये सभी ब्रह्मांड मिलकर एकपाद-विभूति, या भगवान की सृजनात्मक ऊर्जा की अभिव्यक्ति का एक चौथाई हिस्सा बनाते हैं। उनकी ऊर्जा के अन्य तीन चौथाई भाग आध्यात्मिक दुनिया में प्रदर्शित होते हैं, और इसलिए एक छोटे से मस्तिष्क वाला एक छोटे से वैज्ञानिक को पूर्ण भगवान, भगवान कृष्ण के बारे में क्या पता हो सकता है? इसलिए भगवान कहते हैं, मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परम अव्ययम: भौतिक प्रकृति के ऐसे रूपों से भ्रमित होकर, वे यह नहीं समझ सकते कि इन अभिव्यक्तियों से परे एक सर्वोच्च व्यक्ति है जो हर चीज का पूर्ण नियंत्रक है। ब्रह्मा, नारद और भगवान शिव भगवान के बारे में काफी हद तक जानते हैं, और इसलिए व्यक्ति को एक छोटे से मस्तिष्क और अंतरिक्ष यान और विज्ञान के समान उत्पादों जैसी अपनी चंचल खोजों से संतुष्ट होने के बजाय इन महान व्यक्तित्वों के निर्देशों का पालन करना चाहिए। जिस प्रकार माता ही किसी बच्चे के पिता की पहचान करने का एकमात्र अधिकार है, उसी प्रकार वेद माता भी ब्रह्मा, नारद या शिव जैसे मान्यता प्राप्त अधिकार द्वारा प्रस्तुत, पूर्ण सत्य के बारे में हमें सूचित करने का एकमात्र अधिकार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥