मां च योअव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
इसलिए, जो कोई भी अपने हृदय और आत्मा से ईमानदारी से भगवान के साथ दिव्य प्रेममय सेवा के संबंध में सपंर्क बनाना चाहता है, उसकी वाणी और कार्य निश्चय ही अचूक होंगे। इसका कारण यह है कि सर्वोच्च भगवान पूर्ण सत्य हैं, और पूर्ण सत्य के साथ ईमानदारी से जुड़ने वाली कोई भी चीज वही दिव्य गुण प्राप्त कर लेती है। दूसरी ओर, भौतिक विज्ञान और ज्ञान के सहारे मन से जितना भी विचार किया जाए, किंतु पूर्ण सत्य से वास्तविक रूप से जुड़ाव के अभाव में वह निश्चित रूप से एक सांसारिक असत्य और विफलता साबित होगी, क्योंकि उसका पूर्ण सत्य से कोई संपर्क नहीं है। ईश्वरविहीन, विश्वासघाती शब्द और कार्य, भले ही भौतिक रूप से कितने भी समृद्ध हों, पर कभी भरोसेमंद नहीं हो सकते। यह इस महत्वपूर्ण श्लोक का भाव है। एक कण भर भक्ति भी टन भर विश्वासघात से अधिक मूल्यवान है।
