श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.6.32 
सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वश: ।
विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
उनकी इच्छा से मैं सृष्टि करता हूँ, भगवान शिव विनाश करते हैं और वे स्वयं अपने शाश्वत व्यक्तित्व रूप में सभी का पालन करते हैं। वे इन तीनों शक्तियों के शक्तिशाली नियामक हैं।
 
By His will I create, Lord Shiva destroys and He Himself in His eternal form of God maintains all. He is the powerful controller of these three powers.
तात्पर्य
यहाँ पर नि:संदेह बिना किसी दूसरे के होने वाले की धारणा स्पष्ट रूप से पुष्ट की गई है। वह एक भगवान वासुदेव हैं और केवल उनकी विभिन्न ऊर्जाओं और विस्तार से ही भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दुनियाओं में अलग-अलग प्रकटिकरण होते हैं। भौतिक दुनिया में भी, जैसा कि भगवद-गीता (7.19) में कहा गया है, भगवान वासुदेव ही सब कुछ हैं। वासुदेवः सर्वमिति: सब कुछ सिर्फ वासुदेव ही हैं। वैदिक स्तोत्रों में भी वही वासुदेव परम माने गए हैं। वेदों में कहा गया है, वासुदेवात् परो ब्रह्म ना चान्योऽर्थोऽस्ति तत्वतः: वास्तव में वासुदेव से बड़ा कोई सत्य नहीं है। और भगवान कृष्ण ने भी भगवद-गीता (7.7) में इसी सत्य की पुष्टि की है। मत्तः परतरं नान्यत्: "मुझ [भगवान कृष्ण] से ऊपर कुछ नहीं है।" इसलिए व्यक्तित्वहीनतावादी द्वारा अति जोर देने वाली एकता की धारणा भगवान के व्यक्तिवादी भक्त द्वारा भी स्वीकार की जाती है। अंतर यह है कि व्यक्तित्वहीनतावादी अंतिम मुद्दे में व्यक्तित्व को नकारता है, जबकि भक्त ईश्वर के व्यक्तित्व को अधिक महत्व देता है। श्रीमद्-भागवतम इस सत्य को चर्चाधीन छंद में समझाता है: भगवान वासुदेव बिना दूसरे के एक हैं, लेकिन क्योंकि वह सर्वशक्तिमान हैं, वह अपने आप को खुद में समाहित कर सकते हैं और साथ ही अपनी सर्वशक्तिमानता को भी प्रदर्शित कर सकते हैं। भगवान को यहां तीन ऊर्जाओं (त्रि-शक्ति-धृक्) द्वारा सर्वशक्तिमान के रूप में वर्णित किया गया है। तो मुख्य रूप से उनकी तीन ऊर्जाएं आंतरिक, सीमांत और बाहरी हैं। यह बाहरी ऊर्जा भी अच्छाई, जुनून और अज्ञानता के तीन तरीकों में प्रदर्शित होती है। इसी तरह, आंतरिक शक्ति भी तीन आध्यात्मिक तरीकों में प्रदर्शित होती है - संवित, संहिनी और ह्लादिनी। सीमांत शक्ति, या जीवित संस्थाएं भी आध्यात्मिक हैं (प्रकृतिं विद्धि मे पराम), लेकिन जीवित संस्थाएं कभी भी भगवान के बराबर नहीं होती हैं। भगवान निरस्त-साम्य-अतिशय हैं; दूसरे शब्दों में, कोई भी सर्वोच्च भगवान से बड़ा या बराबर नहीं है। इसलिए जीवित संस्थाएं, जिनमें भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे महान व्यक्तित्व भी शामिल हैं, सभी भगवान के अधीन हैं। भौतिक दुनिया में भी, विष्णु के अपने शाश्वत रूप में, वह ब्रह्मा और शिव सहित सभी देवताओं के सभी मामलों का पालन और नियंत्रण करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)