श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.6.31 
नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् ।
गृहीतमायोरुगुण: सर्गादावगुण: स्वत: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए सभी ब्रह्मांडों की भौतिक अभिव्यक्तियाँ उनकी शक्तिशाली भौतिक ऊर्जाओं में स्थित हैं, जिन्हें वो आत्मनिर्भरतापूर्वक स्वीकार करते हैं, यद्यपि वो भौतिक गुणों से हमेशा ही दूर रहते हैं।
 
Therefore the material manifestations of all the universes are situated in His powerful material energies, which He automatically accepts, although He is eternally detached from the material qualities.
तात्पर्य
ब्रह्मा के सम्मुख नारद द्वारा रची गई भौतिक सृष्टि के निरक्षण का प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है। भौतिक क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं, जैसा कि भौतिक वैज्ञानिक सतही रूप से देख सकते हैं, सृजन, अनुरक्षण और विनाश के संबंध में मूलभूत रूप से सत्य नहीं हैं। भौतिक ऊर्जा भगवान की एक शक्ति है जो समय में प्रदर्शित होती है, विष्णु, ब्रह्मा और शिव के रूप में अच्छाई, जुनून और अज्ञान के तीन गुणों को स्वीकार करती है। भौतिक ऊर्जा इस प्रकार उनकी आधिपत्य मंत्र के तहत काम करती है, यद्यपि वह हमेशा ऐसी सभी भौतिक गतिविधियों से परे होते हैं। एक धनी व्यक्ति संसाधनों के रूप में अपनी ऊर्जा खर्च करके एक बड़ा घर बनाता है, और इसी तरह वह अपने संसाधनों से एक बड़ा घर नष्ट कर देता है, लेकिन रखरखाव हमेशा उसकी व्यक्तिगत देखभाल में रहता है। भगवान सबसे अमीर हैं क्योंकि वह हमेशा छह ऐश्वर्यों में पूर्ण होते हैं। इसलिए उसे व्यक्तिगत रूप से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन भौतिक दुनिया में सब कुछ उसकी इच्छा और दिशा द्वारा किया जाता है; इसलिए, संपूर्ण भौतिक अभिव्यक्ति भगवान की सर्वोच्च व्यक्तित्व नारायण में स्थित है। सर्वोच्च सत्य की अवैयक्तिक अवधारणा केवल ज्ञान की कमी के कारण होती है, और इस तथ्य को स्पष्ट रूप से ब्रह्माजी द्वारा समझाया गया है, जिन्हें सार्वभौमिक मामलों का निर्माता माना जाता है। ब्रह्माजी वैदिक ज्ञान में सर्वोच्च प्राधिकारी हैं, और इस संबंध में उनका दावा इसलिए सर्वोच्च जानकारी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)