भोक्तारं यज्ञ-तपसां
सर्व-लोक-महेश्वरम्
सुहृदं सर्व-भूतनाम
ज्ञात्वा मां शान्तिम ऋच्छति
कर्म-योगी जानते हैं कि पूर्ण भगवान सभी यज्ञों और तपस्या जीवन के वास्तविक भोक्ता और पोषक हैं। वे यह भी जानते हैं कि भगवान सभी ग्रहों के परम स्वामी हैं और सभी जीवित संस्थाओं के सच्चे मित्र हैं। इस प्रकार के ज्ञान को धीरे-धीरे कर्म-योगी को भगवान के पवित्र भक्तों के सहयोग के माध्यम से भगवान के शुद्ध भक्तों में बदल देता है, और इस प्रकार वे भौतिक बंधन से मुक्त होने में सक्षम होते हैं।
भौतिक दुनिया के भीतर मूल जीवित प्राणी ब्रह्मा ने हमें बलिदान का तरीका सिखाया। शब्द "बलिदान" किसी दूसरे व्यक्ति की संतुष्टि के लिए स्वयं के हितों के समर्पण का सुझाव देता है। यही सभी गतिविधियों का तरीका है। प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों को दूसरों के लिए बलिदान कर रहा है, या तो परिवार, समाज, समुदाय, देश या संपूर्ण मानव समाज के रूप में। लेकिन इस तरह के बलिदानों की पूर्णता तब प्राप्त होती है जब उन्हें सर्वोच्च व्यक्ति, भगवान की खातिर किया जाता है। क्योंकि भगवान हर चीज के स्वामी हैं, क्योंकि भगवान सभी जीवित प्राणियों के मित्र हैं, और क्योंकि वह बलिदान करने वाले के रक्षक हैं, साथ ही बलिदानों की सामग्रियों के आपूर्तिकर्ता भी हैं, केवल वही और कोई नहीं है जिसे सभी बलिदानों से संतुष्ट होना चाहिए।
पूरी दुनिया सीखने को बढ़ावा देने, सामाजिक उत्थान, आर्थिक विकास और मानवीय स्थिति के कुल सुधार के लिए ऊर्जा का त्याग करने में लगी हुई है, लेकिन भगवद्गीता में सलाह के अनुसार, कोई भी भगवान की खातिर बलिदान करने में रुचि नहीं रखता है। इसलिए, दुनिया में कोई शांति नहीं है। अगर लोग दुनिया में शांति चाहते हैं, तो उन्हें सर्वोच्च मालिक और सभी के मित्र के हित में बलिदान का अभ्यास करना चाहिए।
