आनंद-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिः
ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः
गोलोक एवं निवसत्यखिल-आत्म-भूतः
गोविन्दं आदि-पुरुषं तमहं भजामि
"भगवान गोविंद, जो अपनी व्यक्तिगत शारीरिक किरणों से हर किसी की इंद्रियों को जीवंत करते हैं, अपने दिव्य निवास, गोलोक में निवास करते हैं। फिर भी वह भौतिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों की विविधता में पूर्ण एकता को प्रदर्शित करते हुए, अपनी अकल्पनीय शक्ति से या वह एक है, या बिना किसी दूसरे के, सर्वोच्च सृष्टिकर्ता विद्यमान है। वह हर चीज़ से अलग हैं, और फिर भी कुछ भी उनसे अलग नहीं है।"
