क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि
सर्वक्षेत्रेषु भारत
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं
यत्तज्ज्ञानं मतं मम
क्षेत्र का अर्थ है स्थान, और जो स्थान को जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं। व्यक्तिगत आत्मा अपनी सीमित गतिविधियों के क्षेत्र के बारे में जानता है, लेकिन परम आत्मा, भगवान, असीमित गतिविधियों के क्षेत्र के बारे में जानता है। व्यक्तिगत आत्मा अपनी सोच, भावना और इच्छा संबंधी गतिविधियों के बारे में जानता है, लेकिन परमात्मा, या सर्वोच्च नियंत्रक परमात्मा, हर जगह उपस्थित होकर सबकी सोच, भावना और इच्छा संबंधी गतिविधियों को जानता है, और इस तरह, व्यक्तिगत जीव अपने व्यक्तिगत मामलों का छोटा मालिक होता है जबकि भगवान सभी के मामलों का अतीत, वर्तमान और भविष्य का मालिक होता है (वेदाहं समतीतानि, आदि)। केवल अज्ञानी व्यक्ति ही भगवान और जीवों के बीच के इस अंतर को नहीं जानता। अज्ञानी पदार्थ से अलग जीव, ज्ञान में भगवान के बराबर हो सकते हैं, लेकिन जीव कभी भी अतीत, वर्तमान और भविष्य के पूर्ण ज्ञान में भगवान के समान नहीं हो सकता।
और क्योंकि जीव आंशिक रूप से जानकार है, इसलिए वह कभी-कभी अपनी पहचान भूल जाता है। यह विस्मृति विशेष रूप से भगवान की एकपाद-विभूति क्षेत्र में प्रकट होती है, या भौतिक दुनिया में, लेकिन त्रिपाद-विभूति कार्य क्षेत्र में या आध्यात्मिक दुनिया में, जीवों द्वारा कोई विस्मृति नहीं होती है, जो विस्मृति की स्थिति से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के दूषित पदार्थों से मुक्त होती है। भौतिक शरीर विस्मृति के स्थूल और सूक्ष्म रूप का प्रतीक है। इसलिए भौतिक दुनिया के पूरे वातावरण को अविद्या या अज्ञान कहा जाता है, जबकि आध्यात्मिक दुनिया के पूरे वातावरण को विद्या या पूर्ण ज्ञान कहा जाता है। अविद्या के विभिन्न चरण होते हैं, और उन्हें धर्म, अर्थ और मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष या मुक्ति का विचार, जो एकेश्वरवादी के द्वारा जीव और भगवान की एकता के मामले में अंततः एक में विलय करके रखा जाता है, भौतिकवाद या विस्मृति की अंतिम अवस्था भी है। आत्म और परमात्मा की गुणात्मक एकता का ज्ञान आंशिक ज्ञान और अज्ञान भी है क्योंकि ऊपर बताए अनुसार मात्रात्मक अंतर का कोई ज्ञान नहीं है। व्यक्तिगत आत्मा कभी भी ज्ञान में भगवान के बराबर नहीं हो सकता; अन्यथा उसे विस्मरण की स्थिति में नहीं रखा जा सकता था। तो, क्योंकि व्यक्तिगत आत्माओं या जीवों की विस्मरण की स्थिति होती है, इसलिए भगवान और जीव के बीच हमेशा एक गहरी खाई होती है, जैसे भाग और पूरे के बीच होता है। भाग कभी भी पूरे के बराबर नहीं होता। इसलिए जीव के भगवान के साथ एक-सौ प्रतिशत समानता की अवधारणा भी अज्ञान है।
अज्ञान के क्षेत्र में, गतिविधियाँ सृष्टि पर प्रभुता स्थापित करने की दिशा में निर्देशित होती हैं। भौतिक दुनिया में, इसलिए, हर कोई भौतिक दुनिया पर प्रभुता स्थापित करने के लिए भौतिक वैभव प्राप्त करने में लगा हुआ है। इसलिए हमेशा टकराव और निराशा होती है, जो अज्ञान के लक्षण हैं। लेकिन ज्ञान के क्षेत्र में, भगवान की भक्ति भावना होती है (भक्ति)। इसलिए भक्ति गतिविधियों की मुक्ति अवस्था में अज्ञान या विस्मृति (अविद्या) के प्रभाव से दूषित होने का कोई मौका नहीं है। इस प्रकार भगवान अज्ञान और ज्ञान दोनों के क्षेत्रों का स्वामी है, और यह जीव का चुनाव बना रहता है कि वह उपरोक्त क्षेत्रों में से किसी में भी मौजूद रहे।
