मानव जीवन का सर्वोच्च लाभ प्रदान करने के लिए, वर्णाश्रम प्रणाली अनुयायी को ब्रह्मचारी के आदेश से शुरू करने वाले ब्रह्मचर्य के व्रत को अपनाने के लिए प्रशिक्षित करती है। ब्रह्मचर्य जीवन उन छात्रों के लिए होता है जिन्हें ब्रह्मचर्य के व्रत का कड़ाई से पालन करने के लिए शिक्षित किया जाता है। जिन युवाओं ने कामुक जीवन का कोई स्वाद नहीं लिया है, वे आसानी से ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन कर सकते हैं, और एक बार ऐसे जीवन के सिद्धांत में तय हो जाने पर, व्यक्ति बहुत आसानी से उच्चतम पूर्णता अवस्था तक जारी रख सकता है, जो प्रभु की तीन-चौथाई ऊर्जा के राज्य को प्राप्त करता है। यह पहले ही समझाया जा चुका है कि प्रभु की तीन-चौथाई ऊर्जा के ब्रह्माण्ड में न तो मृत्यु है और न ही भय, और व्यक्ति आनंद और ज्ञान के आनंदमय जीवन से भरा होता है। पारिवारिक जीवन से जुड़ा हुआ एक गृहस्थ उस तरह के यौन भोग के जीवन को आसानी से छोड़ सकता है अगर उसे ब्रह्मचारी के जीवन के सिद्धांतों में प्रशिक्षित किया गया हो। एक गृहस्थ को पचास साल के अंत में घर छोड़ने की सलाह दी जाती है (पंचशोर्ध्वं वनं व्रजेत) और जंगल में जीवन व्यतीत करें; फिर, पारिवारिक स्नेह से पूरी तरह से अलग होकर, वह प्रभु की सेवा में पूरी तरह से लीन होकर एक संन्यासी के रूप में त्याग के आदेश को स्वीकार कर सकता है। धार्मिक सिद्धांतों का कोई भी रूप जिसमें अनुयायियों को ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है वह मनुष्य के लिए अच्छा है क्योंकि केवल वे जो उस तरह से प्रशिक्षित होते हैं वे भौतिक अस्तित्व के दयनीय जीवन को समाप्त कर सकते हैं। निर्वाण के सिद्धांत, जैसा कि भगवान बुद्ध द्वारा अनुशंसित किया गया है, का भी उपयोग भौतिक अस्तित्व के दयनीय जीवन को समाप्त करने के लिए किया जाता है। और इस प्रक्रिया की सर्वोच्च डिग्री में, श्रीमद-भागवतम में स्पष्ट रूप से आदर्श पूर्णता की अवधारणा के साथ अनुशंसा की गई है, हालांकि मूल रूप से बौद्धों, शंकराचार्यों और वैष्णवों की प्रक्रिया के बीच कोई अंतर नहीं है। पूर्णता की उच्चतम स्थिति, अर्थात जन्म और मृत्यु, चिंता और भय से मुक्ति में पदोन्नति के लिए, इनमें से कोई भी प्रक्रिया अनुयायी को ब्रह्मचर्य के व्रत को तोड़ने की अनुमति नहीं देती है।
गृहस्थों और उन लोगों जो संन्यास के व्रत को तोड़ चुके हैं वह अमरता के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। धर्मपरायण गृहस्थ या पतित योगी या पतित पारलौकिकतावादी लोगों को भौतिक जगत में उच्च ग्रहों (श्रीमान् की एक चौथाई ऊर्जा) में प्रोन्नत किया जा सकता है, लेकिन वे अमरता के राज्य में प्रवेश करने में विफल रहेंगे। अबृहद-व्रत वे हैं जिन्होंने संन्यास के व्रत को तोड़ दिया है। वानप्रस्थ, या वे जो पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त हो गए हैं, और संन्यासी, या त्यागी व्यक्ति, संन्यास के व्रत को नहीं तोड़ सकते हैं यदि वे इस प्रक्रिया में सफलता चाहते हैं। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी पुनर्जन्म (अप्रज) नहीं लेने जा रहे हैं, न ही वे गुप्त रूप से यौन जीवन में लिप्त रहने के लिए बने हैं। अध्यात्मवादी द्वारा ऐसे पतन की क्षतिपूर्ति विद्वान ब्राह्मणों या अमीर व्यापारियों के अच्छे परिवारों में पुनः ऊपर उठने के लिए मानव जीवन के लिए एक और अवसर मिलने से हो सकती है, लेकिन मानव जीवन प्राप्त होते ही जल्द से जल्द अमरत्व की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करना सबसे अच्छी बात है; अन्यथा मानव जीवन की पूरी नीति पूरी तरह विफल साबित होगी। इस संन्यास के मामले में अपने भक्तों को सलाह देने में भगवान चैतन्य बहुत सख्त थे। उनके निजी सहयोगियों में से एक, छोटा हरिदास, को भगवान चैतन्य द्वारा संन्यास के व्रत का पालन करने में उनकी विफलता के कारण कड़ी सजा दी गई थी। इसलिए, एक पारलौकिकतावादी के लिए, जो भौतिक दुखों से परे राज्य में प्रोन्नत होने की इच्छा रखता है, विशेष रूप से जीवन के परित्यक्त क्रम में, जानबूझकर यौन जीवन में शामिल होना आत्महत्या से भी बदतर है। तपस्वी जीवन के क्रम में यौन जीवन धार्मिक जीवन का सबसे विकृत रूप है, और ऐसे गुमराह व्यक्ति को केवल तभी बचाया जा सकता है, जब संयोग से, उसे एक शुद्ध भक्त मिले।
