भौतिक दुनिया में, ग्रह प्रणालियों को त्रिलोक या स्वर्ग, मर्त्य और पाताल नामक तीन क्षेत्रों में व्यवस्थित किया जाता है, और ये सभी संधिनी ऊर्जा के कुल एक चौथाई भाग का ही गठन करते हैं। इसके आगे आध्यात्मिक आकाश है जहां वैकुण्ठ ग्रह सात भौतिक स्तरों के आवरण से परे मौजूद हैं। त्रिलोक ग्रह प्रणालियों में से किसी में भी कोई अमरता, पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनंद की स्थिति का अनुभव नहीं कर सकता है। ऊपरी तीन ग्रह प्रणालियों को सात्विक ग्रह कहा जाता है क्योंकि वे लंबे जीवन और बीमारी और बुढ़ापे से सापेक्ष स्वतंत्रता के साथ-साथ निडरता की भावना के लिए सुविधाएँ प्रदान करते हैं। महान ऋषियों और संतों को स्वर्गीय ग्रहों से परे महर्लोक में पदोन्नत किया जाता है, लेकिन वह भी पूर्ण निडरता का स्थान नहीं है क्योंकि एक कल्प के अंत में महर्लोक का नाश हो जाता है और निवासियों को स्वयं को अभी भी उच्च ग्रहों पर ले जाना पड़ता है। फिर भी इन ग्रहों पर भी कोई भी मृत्यु से मुक्त नहीं है। जीवन का तुलनात्मक विस्तार, ज्ञान का विस्तार और पूर्ण आनंद की भावना हो सकती है, लेकिन तथ्यात्मक अमरता, निडरता और वृद्धावस्था, रोगों आदि से मुक्ति केवल भौतिक आकाश के आवरण के भौतिक क्षेत्रों से परे संभव है। ऐसी चीजें सिर पर स्थित होती हैं (अधायी मूर्धसु)।
