श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.6.19 
पादेषु सर्वभूतानि पुंस: स्थितिपदो विदु: ।
अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान अपनी चतुर्थांश शक्ति के माध्यम से सभी भौतिक ऐश्वर्य के सर्वोच्च स्त्रोत के रूप में जाने जाते हैं, जिसमें सभी जीवों का अस्तित्व बना हुआ है। भगवान का राज्य, जो तीनों उच्चतर ग्रह प्रणालियों से परे और भौतिक आवरणों से भी परे है, वह अमरता, निर्भयता, और बुढ़ापा और बीमारी की चिंताओं से मुक्ति का स्थायी निवास है।
 
The Supreme Personality of Godhead, by His one-fourth energy, is known as the ultimate repository of all material opulence in which all living entities are living. The abode of the Lord, which is situated beyond the three higher planets and material coverings, is the eternal abode of immortality, fearlessness and freedom from old age and disease.
तात्पर्य
भगवान की संधिनी ऊर्जा के कुल प्रकटीकरण में से एक चौथाई भौतिक जगत् में दिखाई देता हे और तीन चौथाई आध्यात्मिक जगत् में दिखाई देता हे। भगवान की ऊर्जा को तीन अवयवों में विभाजित किया गया हे, अर्थात् संधिनी, संवित और ह्लादिनी; दूसरे शब्दों में, वह अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की पूरी अभिव्यक्ति हैं। भौतिक दुनिया में अस्तित्व, ज्ञान और सुख की ऐसी भावना कम ही प्रदर्शित होती है, और सभी जीवित इकाइयाँ, जो भगवान के सूक्ष्म भाग और पार्सल हैं, मुक्त अवस्था में अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की ऐसी चेतना का आनंद लेने के पात्र हैं, जबकि भौतिक अस्तित्व के वातानुकूलित अवस्था में वे शायद ही सराहना कर सकते हैं कि जीवन की तथ्यात्मक, अस्तित्वपरक, संज्ञेय और शुद्ध खुशी क्या है। मुक्त आत्माएँ, जो भौतिक दुनिया में उन आत्माओं की तुलना में कहीं अधिक संख्यात्मक ताकत में मौजूद हैं, तथ्यतः भगवान की उपर्युक्त संधिनी, संवित और ह्लादिनी शक्तियों की शक्ति का अनुभव अमरता, निर्भयता और वृद्धावस्था और बीमारी से मुक्ति में कर सकती हैं।

भौतिक दुनिया में, ग्रह प्रणालियों को त्रिलोक या स्वर्ग, मर्त्य और पाताल नामक तीन क्षेत्रों में व्यवस्थित किया जाता है, और ये सभी संधिनी ऊर्जा के कुल एक चौथाई भाग का ही गठन करते हैं। इसके आगे आध्यात्मिक आकाश है जहां वैकुण्ठ ग्रह सात भौतिक स्तरों के आवरण से परे मौजूद हैं। त्रिलोक ग्रह प्रणालियों में से किसी में भी कोई अमरता, पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनंद की स्थिति का अनुभव नहीं कर सकता है। ऊपरी तीन ग्रह प्रणालियों को सात्विक ग्रह कहा जाता है क्योंकि वे लंबे जीवन और बीमारी और बुढ़ापे से सापेक्ष स्वतंत्रता के साथ-साथ निडरता की भावना के लिए सुविधाएँ प्रदान करते हैं। महान ऋषियों और संतों को स्वर्गीय ग्रहों से परे महर्लोक में पदोन्नत किया जाता है, लेकिन वह भी पूर्ण निडरता का स्थान नहीं है क्योंकि एक कल्प के अंत में महर्लोक का नाश हो जाता है और निवासियों को स्वयं को अभी भी उच्च ग्रहों पर ले जाना पड़ता है। फिर भी इन ग्रहों पर भी कोई भी मृत्यु से मुक्त नहीं है। जीवन का तुलनात्मक विस्तार, ज्ञान का विस्तार और पूर्ण आनंद की भावना हो सकती है, लेकिन तथ्यात्मक अमरता, निडरता और वृद्धावस्था, रोगों आदि से मुक्ति केवल भौतिक आकाश के आवरण के भौतिक क्षेत्रों से परे संभव है। ऐसी चीजें सिर पर स्थित होती हैं (अधायी मूर्धसु)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)