पराभूतेरधर्मस्य तमसश्चापि पश्चिम: ।
नाड्यो नदनदीनां च गोत्राणामस्थिसंहति: ॥ १० ॥
अनुवाद
भगवान की पीठ पर हर तरह की हताशा और अज्ञानता तथा अनैतिकता का वास है। उनकी नसों से नदियाँ और नदियाँ बहती हैं, और उनकी हड्डियों पर बड़े-बड़े पहाड़ बने होते हैं।
The Lord's back is the seat of all kinds of anxiety, ignorance and immorality. Rivers and streams flow through His veins and large mountains are formed on His bones.
तात्पर्य
परमपुरुष ईश्वर के निर्वैयक्तिक संकल्पना की अनदेखी करने के लिए यहाँ उनके पारलौकिक शरीर के शारीरिक और रचनात्मक संविधान का व्यवस्थित विश्लेषण दिया गया है। भगवान के शरीर (उनके सार्वभौमिक स्वरूप) के उपलब्ध विवरण से यह स्पष्ट है कि भगवान का स्वरूप सांसारिक संकल्पना के सामान्य रूपों से भिन्न है। किसी भी मामले में, वह कभी भी निराकार शून्य नहीं है। अज्ञानता भगवान की पीठ है, और इसलिए कम बुद्धिमान वर्ग के लोगों का अज्ञान भी उनकी शारीरिक अवधारणा से अलग नहीं है। चूंकि उनका शरीर हर उस चीज का संपूर्ण संघटन है जो है, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि वह केवल एक अचेतन बिंदु है। इसके विपरीत, प्रभु का परिपूर्ण वर्णन कहता है कि वह एक साथ काल्पनिक और व्यक्तिगत दोनों हैं। ईश्वर का व्यक्तित्व भगवान की मूल विशेषता है, और उनका काल्पनिक प्रवाह उनके पारलौकिक शरीर का सिर्फ प्रतिबिंब है। जो लोग भाग्यशाली हैं कि उन्होंने भगवान को सामने से देखा है, वे उनकी व्यक्तिगत विशेषता को समझ सकते हैं, जबकि जो निराश हैं और इस प्रकार प्रभु के अज्ञानता पक्ष पर रखे गए हैं, या दूसरे शब्दों में, जिन लोगों ने भगवान को पीछे से देखा है, वे उनको उनकी काल्पनिक विशेषता से पहचानते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥