सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं
तत्-परत्वेन निर्मलं
हृषीकेणा हृषीकेश-
सेवनं भक्तिरुच्यते
मूल रूप से, चूँकि सभी इंद्रियाँ भगवान के इंद्रिय भंडार से उत्पन्न होती हैं, भौतिक दुनिया की कामुक गतिविधियों को भक्ति सेवा की प्रक्रिया से शुद्ध किया जाना है, और इस प्रकार जीवन की पूर्णता केवल हमारे भौतिक गतिविधियों की वर्तमान स्थिति को शुद्ध करके प्राप्त की जा सकती है। और शुद्धिकरण प्रक्रिया विभिन्न पदनामों की अवधारणा से मुक्त होने के चरण से शुरू होती है। प्रत्येक जीवित सत्ता किसी न किसी प्रकार की सेवा में निरत है, या तो स्वयं के लिए, या परिवार के लिए, या समाज, देश आदि के लिए, लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसी सभी सेवाएँ भौतिक आसक्ति के कारण प्रस्तुत की जाती हैं। भौतिक संबंधों के लगाव को केवल भगवान की सेवा में बदला जा सकता है, और इस प्रकार भौतिक आसक्ति से मुक्त होने का उपचार स्वतः ही शुरू हो जाता है। इसलिए भक्ति सेवा के माध्यम से किसी भी अन्य विधि की तुलना में मुक्ति की प्रक्रिया आसान है, क्योंकि भगवद-गीता (12.5) में कहा गया है कि यदि कोई अवैयक्तिक रूप से जुड़ा हुआ है तो उसे विभिन्न प्रकार की क्लेशों के अधीन किया जाता है: क्लेशो ऽधिकतर आसां अव्यक्तासक्त-चेतसाम।
