श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.5.7 
स भवानचरद् घोरं यत् तप: सुसमाहित: ।
तेन खेदयसे नस्त्वं पराशङ्कां च यच्छसि ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
फिर भी जब हम आपके द्वारा पूर्ण अनुशासन में रहते हुए सम्पन्न कठिन तपस्याओं के विषय में सोचते हैं, तो हमें आपसे भी अधिक शक्तिशाली किसी व्यक्ति के अस्तित्व के विषय में आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है, यद्यपि आप सृजन के मामले में स्वयं इतने शक्तिशाली हैं।
 
Yet when we think of the difficult austerities performed by You while living in perfect discipline, we are left wondering about the existence of someone more powerful than You, although You are so powerful in matters of creation.
तात्पर्य
श्री नारद मुनि के चरण चिह्नों का अनुसरण करते हुए, किसी को भी आँख बंद करके अपने आध्यात्मिक गुरु को स्वयं भगवान के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। एक आध्यात्मिक गुरु का भगवान के समान ही सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन एक आध्यात्मिक गुरु जो स्वयं को भगवान होने का दावा करता है, उसे तुरंत अस्वीकार कर देना चाहिए। नारद मुनि ने ब्रह्मा को उनकी विलक्षण सृजन शक्तियों के कारण परम मान लिया था। लेकिन उनमें संदेह पैदा हुआ, जब उन्होंने देखा कि भगवान ब्रह्मा भी किसी उच्चतर शक्ति की पूजा करते हैं। परम श्रेष्ठ परम है और उनकी कोई पूजनीय श्रेष्ठ शक्ति नहीं है। अहंकारोपासिता या वह जो स्वयं को भगवान बनने के विचार से पूजता है, वह भ्रामक है। लेकिन एक बुद्धिमान शिष्य तुरंत महसूस कर सकता है कि सर्वोच्च ईश्वर को भगवान बनने के लिए किसी की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। अहंकारोपासना आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए एक प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन अहंकारोपासिता कभी भी स्वयं भगवान नहीं हो सकता। कोई भी आध्यात्मिक साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुज़रकर भगवान नहीं बन सकता। नारद मुनि ने ब्रह्माजी को सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में माना। लेकिन जब उन्होंने ब्रह्माजी को आध्यात्मिक साक्षात्कार की प्रक्रिया में लगा हुआ देखा, तो उन्हें संदेह हुआ। इसलिए वे स्पष्ट रूप से सूचित होना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)