श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  2.5.40-41 
तत्कट्यां चातलं क्लृप्तमूरुभ्यां वितलं विभो: ।
जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम् ॥ ४० ॥
महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम् ।
पातालं पादतलत इति लोकमय: पुमान् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय पुत्र नारद, मुझसे जान लो कि चौदह लोकों में से सात अधोलोक हैं। पहला अधोलोक अतल है, जो कटि में स्थित है। दूसरा अधोलोक वितल है, जो जाँघों में स्थित है। तीसरा अधोलोक सुतल है, जो घुटनों में स्थित है। चौथा अधोलोक तलातल है, जो पिंडलियों में स्थित है। पाँचवाँ अधोलोक महातल है, जो टखनों में स्थित है। छठा अधोलोक रसातल है, जो पाँवों के ऊपरी भाग में स्थित है। और सातवाँ अधोलोक पाताल लोक है, जो तलवों में स्थित है। इस प्रकार भगवान् का विराट रूप समस्त लोकों से पूर्ण है।
 
O son of Narada, you should know from me that out of the fourteen worlds, seven are the lower worlds. The first world is Atal, which is situated in the waist, the second world Vital is situated in the thighs, the third world Sutal is in the knees, the fourth world Talatal is in the calves, the fifth world Mahatal is in the ankles, the sixth world is Rasatal, which is situated in the upper part of the feet and the seventh world is Patal Lok, which is situated in the soles. In this way, the huge form of God is full of all the worlds.
तात्पर्य
आधुनिक उद्यमी ( अंतरिक्ष में यात्रा करने वाले अंतरिक्षयात्री) श्रीमद्-भागवतम से सूचना ले सकते हैं कि अंतरिक्ष में ग्रहीय प्रणालियों के चौदह विभाजन हैं। स्थिति की गणना सांसारिक ग्रहीय प्रणाली से की जाती है, जिसे भूलोक कहा जाता है। भूलोक के ऊपर भुवरलोक है, और सबसे ऊपरी ग्रहीय प्रणाली को सत्यलोक कहा जाता है। ये ऊपरी सात लोक, या ग्रह प्रणालियाँ हैं। और इसी तरह सात निचली ग्रह प्रणालियाँ हैं, जिन्हें अतल, विटाला, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल लोक के रूप में जाना जाता है। ये सभी ग्रह प्रणालियाँ पूरे ब्रह्मांड में बिखरी हुई हैं, जो दो अरब गुना दो अरब वर्ग मील के क्षेत्र पर कब्जा करती हैं। आधुनिक अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से केवल कुछ हज़ार मील दूर की यात्रा कर सकते हैं, और इसलिए आकाश में उनकी यात्रा करने का प्रयास एक विस्तृत समुद्र के किनारे बच्चे के खेल जैसा कुछ है। चंद्रमा ऊपरी ग्रह प्रणाली की तीसरी स्थिति में स्थित है, और श्रीमद्-भागवतम के पंचम सर्ग में हम विशाल भौतिक आकाश में बिखरे हुए विभिन्न ग्रहों की दूरस्थ स्थिति को जान पाएंगे। जिस ब्रह्मांड में हम रह रहे हैं उसके अलावा असंख्य ब्रह्मांड हैं, और ये सभी भौतिक ब्रह्मांड आध्यात्मिक आकाश के केवल एक नगण्य हिस्से को कवर करते हैं, जिसे ऊपर सनातन ब्रह्मलोक के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान्-गीता (8.16) के निम्नलिखित श्लोक में परम भगवान् बुद्धिमान मनुष्यों को घर लौटने, भगवान के पास लौटने के लिए बहुत दयालुता से आमंत्रित करते हैं:

आ ब्रह्म भूवनाल लोकाः

पुनरा वर्तिनोऽर्जुन

माम उपेत्य तु कौन्तेय

पुनर्जन्म न विद्यते

ऊपर वर्णित अनुसार, सत्यलोक से शुरू होकर, ब्रह्मलोक के ठीक नीचे स्थित ब्रह्मांड का सबसे ऊपरी ग्रह, सभी ग्रह भौतिक होते हैं। और किसी भी भौतिक ग्रह में किसी की स्थिति अभी भी भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन है, अर्थात् जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी। लेकिन कोई भी उपर्युक्त सभी भौतिक पीड़ाओं से पूर्ण मुक्ति पा सकता है जब वह शाश्वत ब्रह्मलोक सनातन वायुमंडल, भगवान के राज्य में प्रवेश करता है। इसलिए मुक्ति, जैसा कि सैद्धांतिक दार्शनिकों और रहस्यवादियों द्वारा विचार किया जाता है, तभी संभव है जब कोई भगवान का भक्त बन जाता है। जो कोई भक्त नहीं है वह भगवान के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। केवल पारलौकिक स्थिति में सेवा भाव प्राप्त करके ही कोई ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है। इसलिए सैद्धांतिक दार्शनिकों और साथ ही रहस्यवादियों को भी मुक्ति को तभी प्राप्त कर सकते हैं जब वे भक्ति पंथ के प्रति आकर्षित हों।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)