आ ब्रह्म भूवनाल लोकाः
पुनरा वर्तिनोऽर्जुन
माम उपेत्य तु कौन्तेय
पुनर्जन्म न विद्यते
ऊपर वर्णित अनुसार, सत्यलोक से शुरू होकर, ब्रह्मलोक के ठीक नीचे स्थित ब्रह्मांड का सबसे ऊपरी ग्रह, सभी ग्रह भौतिक होते हैं। और किसी भी भौतिक ग्रह में किसी की स्थिति अभी भी भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन है, अर्थात् जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी। लेकिन कोई भी उपर्युक्त सभी भौतिक पीड़ाओं से पूर्ण मुक्ति पा सकता है जब वह शाश्वत ब्रह्मलोक सनातन वायुमंडल, भगवान के राज्य में प्रवेश करता है। इसलिए मुक्ति, जैसा कि सैद्धांतिक दार्शनिकों और रहस्यवादियों द्वारा विचार किया जाता है, तभी संभव है जब कोई भगवान का भक्त बन जाता है। जो कोई भक्त नहीं है वह भगवान के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। केवल पारलौकिक स्थिति में सेवा भाव प्राप्त करके ही कोई ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है। इसलिए सैद्धांतिक दार्शनिकों और साथ ही रहस्यवादियों को भी मुक्ति को तभी प्राप्त कर सकते हैं जब वे भक्ति पंथ के प्रति आकर्षित हों।
