श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.5.39 
ग्रीवायां जनलोकोऽस्य तपोलोक: स्तनद्वयात् ।
मूर्धभि: सत्यलोकस्तु ब्रह्मलोक: सनातन: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के विराट स्वरूप की छाती से लेकर गर्दन तक जनलोक और तपोलोक स्थित हैं, जबकि सर्वोच्च लोक, सत्यलोक, इस विराट स्वरूप के सिर पर मौजूद है। लेकिन, आध्यात्मिक लोक शाश्वत हैं।
 
The region from the chest to the neck of the colossal form of the Lord consists of Janalok and Tapolok, while the highest world, Satyalok, is situated on the head of this colossal form. But the spiritual worlds are eternal.
तात्पर्य
इन पृष्ठों में हम अनेक बार उन आध्यात्मिक ग्रहों की चर्चा कर चुके हैं जो भौतिक आकाश से परे स्थित हैं, और उनके विवरण की पुष्टि इस श्लोक में भी की गई है। ''सनातन'' शब्द सार्थक है। अनंतता के इसी विचार को भगवद्गीता (8.20) में व्यक्त किया गया है, जहाँ यह कहा गया है कि भौतिक सृष्टि से परे आध्यात्मिक आकाश है, जहाँ सब कुछ शाश्वत है। कभी-कभी सत्यलोक, वह ग्रह जहाँ ब्रह्मा निवास करते हैं, को ब्रह्मलोक भी कहा जाता है। परंतु यहाँ वर्णित ब्रह्मलोक, सत्यलोक ग्रह प्रणाली के समान नहीं है। यह ब्रह्मलोक शाश्वत है, जबकि सत्यलोक ग्रह प्रणाली शाश्वत नहीं है। और दोनों में अंतर दर्शाने के लिए, इस मामले में ''सनातन'' विशेषण का उपयोग किया गया है। श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, यह ब्रह्मलोक ब्रह्म, या परम भगवान का लोक या निवास है। आध्यात्मिक आकाश में सभी ग्रह उतने ही अच्छे हैं जितने कि स्वयं भगवान। भगवान पूर्णतः आत्मा हैं, और उनके नाम, ख्याति, गौरव, गुण, लीलाएँ, आदि सभी उनसे पृथक नहीं हैं क्योंकि वे पूर्ण हैं। जैसे, ईश्वर के राज्य के ग्रह भी उनसे अलग नहीं हैं। उन ग्रहों में शरीर और आत्मा में कोई अंतर नहीं है, और न ही समय का कोई प्रभाव है जैसा कि हम भौतिक दुनिया में अनुभव करते हैं। और समय का कोई प्रभाव न होने के अतिरिक्त, ब्रह्मलोक के ग्रह, आध्यात्मिक होने के कारण, कभी नष्ट नहीं होते। आध्यात्मिक ग्रहों में सभी विविधताएँ भी भगवान के साथ एक है, और इसलिए वैदिक सूत्र ''एकम एवाद्वितीयम'' उस आध्यात्मिक विविधता के सनातन वातावरण में पूरी तरह से साकार होता है। यह भौतिक दुनिया भगवान के आध्यात्मिक राज्य की केवल एक छाया है, और क्योंकि यह एक छाया है यह कभी शाश्वत नहीं है; द्वैत (आत्मा और पदार्थ) की भौतिक दुनिया में विविधता की तुलना आध्यात्मिक दुनिया से नहीं की जा सकती। ज्ञान की कमी के कारण, कम बुद्धिमान व्यक्ति कभी-कभी भौतिक दुनिया की स्थितियों को आध्यात्मिक दुनिया के बराबर समझ लेते हैं, और इस प्रकार वे भगवान और भौतिक दुनिया में उनकी लीलाओं को सशर्त आत्माओं और उनकी गतिविधियों के साथ एक समझ लेते हैं। भगवान भगवद्गीता (9.11) में ऐसे कम बुद्धिमान व्यक्तियों की निंदा करते हैं:

अवजानन्ति मां मूढा

मानुषीं तनुमाश्रितम्

परमं भावमजानन्तो

मम भूतामहेश्वरम्

जब भी भगवान अवतार लेते हैं, तो वे अपनी पूर्ण आंतरिक शक्ति (आत्म-माया) में ऐसा करते हैं, और कम बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें भौतिक रचनाओं में से एक मान लेते हैं। इसलिए, श्रील श्रीधर स्वामी ने इस श्लोक पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा है कि यहाँ वर्णित ब्रह्मलोक वैकुण्ठ है, जो ईश्वर का राज्य है, जो सनातन या शाश्वत है, और इसलिए यह ऊपर वर्णित भौतिक रचनाओं जैसा बिल्कुल नहीं है। भगवान का विराट् सार्वभौमिक रूप भौतिक दुनिया के लिए एक कल्पना है। इसका आध्यात्मिक दुनिया या ईश्वर के राज्य से कोई लेना-देना नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)