अवजानन्ति मां मूढा
मानुषीं तनुमाश्रितम्
परमं भावमजानन्तो
मम भूतामहेश्वरम्
जब भी भगवान अवतार लेते हैं, तो वे अपनी पूर्ण आंतरिक शक्ति (आत्म-माया) में ऐसा करते हैं, और कम बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें भौतिक रचनाओं में से एक मान लेते हैं। इसलिए, श्रील श्रीधर स्वामी ने इस श्लोक पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा है कि यहाँ वर्णित ब्रह्मलोक वैकुण्ठ है, जो ईश्वर का राज्य है, जो सनातन या शाश्वत है, और इसलिए यह ऊपर वर्णित भौतिक रचनाओं जैसा बिल्कुल नहीं है। भगवान का विराट् सार्वभौमिक रूप भौतिक दुनिया के लिए एक कल्पना है। इसका आध्यात्मिक दुनिया या ईश्वर के राज्य से कोई लेना-देना नहीं है।
