श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.5.32 
यदैतेऽसङ्गता भावा भूतेन्द्रियमनोगुणा: ।
यदायतननिर्माणे न शेकुर्ब्रह्मवित्तम ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
हे योगियों में श्रेष्ठ नारद, जब तक ये सृजित अंग जैसे कि तत्त्व, इन्द्रियाँ, मन और प्रकृति के गुण इकट्ठे नहीं हो जाते, तब तक शरीर का स्वरूप नहीं लिया जा सकता।
 
O Narada, the best of Yogis, till the time these created parts, viz., the elements, the senses, the mind and the qualities of nature are not united, the body cannot take form.
तात्पर्य
जीवित संस्थाओं के शरीर-निर्माण के विभिन्न प्रकार बिल्कुल मोटर भागों को इकट्ठा करके निर्मित विभिन्न प्रकार की मोटरकारों की तरह ही हैं। जब कार तैयार हो जाती है, तो ड्राइवर कार में बैठता है और वह अपनी इच्छानुसार इसे चलाता है। भगवद्-गीता (18.61) में भी इसकी पुष्टि की जाती है: मानो जीवित संस्था शरीर की मशीन पर बैठा हो, और शरीर की गाड़ी भौतिक प्रकृति के नियंत्रण में चल रही हो, ठीक वैसे ही जैसे रेलवे ट्रेनें नियंत्रक के निर्देशन में चलती हैं। हालाँकि, जीवित संस्थाएँ शरीर नहीं हैं; वे शरीर की कारों से अलग हैं। लेकिन कम बुद्धिमान भौतिक वैज्ञानिक शरीर के अंगों, अर्थात् इंद्रियों, मन और भौतिक प्रकारों के गुणों को इकट्ठा करने की प्रक्रिया को नहीं समझ सकते हैं। प्रत्येक जीवित संस्था एक आध्यात्मिक चिंगारी है, जो सर्वोच्च अस्तित्व का अभिन्न अंग है, और प्रभु की दया से, पिता अपने पुत्रों के प्रति दयालु है, व्यक्तिगत जीवित प्राणियों को भौतिक प्रकृति पर शासन करने की अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए थोड़ी स्वतंत्रता दी जाती है। जैसे एक पिता रोते हुए बच्चे को संतुष्ट करने के लिए उसे कुछ खिलौने देता है, वैसे ही संपूर्ण भौतिक सृष्टि प्रभु की इच्छा से संभव हुई है ताकि भ्रमित जीवित संस्थाओं को प्रभु के एजेंट के नियंत्रण में रहते हुए भी अपनी इच्छा के अनुसार चीजों पर शासन करने की अनुमति दी जा सके। जीवित संस्थाएँ बिल्कुल छोटे बच्चों की तरह हैं जो प्रभु की दासी (प्रकृति) के नियंत्रण में भौतिक क्षेत्र में खेल रहे हैं। वे माया या दासी को सर्वोपरि मानते हैं और इस प्रकार सर्वोच्च सत्य को गलत तरीके से स्त्री (देवी दुर्गा, आदि) मानते हैं। मूर्ख, बच्चों जैसे भौतिकवादी दासी, भौतिक प्रकृति की अवधारणा से आगे नहीं बढ़ सकते हैं, लेकिन प्रभु के बुद्धिमान वयस्क पुत्र अच्छी तरह से जानते हैं कि भौतिक प्रकृति के सभी कार्य प्रभु द्वारा नियंत्रित होते हैं, जैसे एक दासी अधिपति के नियंत्रण में होती है, अविकसित बच्चों का पिता। शरीर के अंग, जैसे इंद्रियाँ महात-तत्त्व की रचना हैं, और जब प्रभु की इच्छा से इन्हें इकट्ठा किया जाता है, तो भौतिक शरीर अस्तित्व में आता है, और जीवित संस्था को आगे की गतिविधियों के लिए इसका उपयोग करने की अनुमति दी जाती है। यह इस प्रकार समझाया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)