श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  2.5.2 
यद्रूपं यदधिष्ठानं यत: सृष्टमिदं प्रभो ।
यत्संस्थं यत्परं यच्च तत् तत्त्वं वद तत्त्वत: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्रिय पिता, कृपया इस दृश्यमान संसार के वास्तविक लक्षणों का वर्णन करें। इसकी पृष्ठभूमि क्या है? इसका निर्माण कैसे हुआ? यह किस प्रकार कायम है? और यह सब किसके नियंत्रण में किया जा रहा है?
 
O father, please describe the real characteristics of this manifested universe. What is its basis? How did it originate? How is it organized? And under whose control is all this being done?
तात्पर्य
तथ्यात्मक कारण और प्रभाव के आधार पर नारद मुनि द्वारा की गई जांच बहुत ही उचित प्रतीत होती है। हालांकि, नास्तिक कारण और प्रभाव के किसी भी संपर्क के बिना कई स्व-निर्मित सिद्धांत सामने रखते हैं। प्रकट दुनिया, साथ ही आत्मा, को अभी भी ईश्वरविहीन नास्तिकों द्वारा प्रायोगिक ज्ञान के माध्यम से अस्पष्टीकृत किया गया है, हालांकि उन्होंने अपने उपजाऊ दिमाग द्वारा निर्मित कई सिद्धांतों को सामने रखा है। हालाँकि, सृजन के ऐसे मानसिक सट्टा सिद्धांतों के विपरीत, नारद मुनि सृजन के सभी तथ्यों को सच्चाई से जानना चाहते थे, सिद्धांतों द्वारा नहीं।

आत्मा और परमात्मा के संबंध में पारलौकिक ज्ञान में अभूतपूर्व दुनिया का ज्ञान और इसके निर्माण का आधार शामिल है। अभूतपूर्व दुनिया में किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा तीन चीजों को तथ्यात्मक रूप से देखा जाता है: जीवित प्राणी, प्रकट दुनिया और उन पर अंतिम नियंत्रण। बुद्धिमान व्यक्ति देख सकता है कि न तो जीवित इकाई और न ही अभूतपूर्व दुनिया संयोग की रचनाएं हैं। सृजन की समरूपता और इसकी नियामक क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ उनके पीछे एक बुद्धिमान मस्तिष्क की योजना का सुझाव देती हैं, और वास्तविक जांच द्वारा कोई भी उस अंतिम कारण का पता लगा सकता है जो उन्हें तथ्यात्मक रूप से जानता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)