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श्लोक 2.5.17  |
तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मन: ।
सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदित: ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| उनके द्वारा अनुप्राणित होकर ही मैं परमात्मा के रूप में नारायण द्वारा सृजित पहले से ही विद्यमान चीज़ों की फिर खोज करता हूँ और स्वयं भी केवल उन्हीं के द्वारा रचा गया हूँ। |
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| उनके द्वारा अनुप्राणित होकर ही मैं परमात्मा के रूप में नारायण द्वारा सृजित पहले से ही विद्यमान चीज़ों की फिर खोज करता हूँ और स्वयं भी केवल उन्हीं के द्वारा रचा गया हूँ। |
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