श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.5.15 
नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजा: ।
नारायणपरा लोका नारायणपरा मखा: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
सारे वैदिक ग्रंथ परमेश्वर से ही बने हैं और उन्हीं के लिए बने हैं। देवता भी भगवान् के शरीर के अंगों की तरह उन्हीं की सेवा के लिए बने हैं। विभिन्न लोक भी भगवान् के लिए हैं और विभिन्न यज्ञ उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए किये जाते हैं।
 
All the Vedic scriptures are created by God and are for His sake. The gods are also there to serve Him in the form of the body parts of God. The various worlds are also for the sake of God and various yagyas are performed to please Him.
तात्पर्य
वेदांत सूत्रों (शास्त्र योनि त्वात) के अनुसार, सर्वोच्च भगवान सभी प्रकट शास्त्रों के लेखक हैं, और सभी प्रकट शास्त्र सर्वोच्च भगवान को जानने के लिए हैं। वेद का मतलब उस ज्ञान से है जो भगवान की ओर ले जाता है। वेदों को केवल बाध्य आत्माओं की भूली हुई चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए बनाया गया है, और नारायण-परा भक्तों द्वारा ईश्वर चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए किसी भी साहित्य को तुरंत खारिज कर दिया जाता है। ज्ञान की ऐसी भ्रामक पुस्तकें, जिनका लक्ष्य नारायण नहीं है, सभी ज्ञान नहीं हैं, बल्कि उन कौए के लिए खेल के मैदान हैं जो दुनिया के अस्वीकृत कचरे में रुचि रखते हैं। ज्ञान (विज्ञान या कला) की कोई भी पुस्तक नारायण के ज्ञान की ओर ले जानी चाहिए; अन्यथा इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। यही ज्ञान की उन्नति का मार्ग है। सर्वोच्च पूजनीय देवता नारायण हैं। नारायण के संबंध में पूजा के लिए देवताओं की दूसरे स्थान पर सिफारिश की जाती है क्योंकि देवता सार्वभौमिक मामलों के प्रबंधन में हाथ बंटा रहे हैं। जैसे किसी राज्य के अधिकारियों का राजा के साथ संबंध के कारण सम्मान किया जाता है, वैसे ही देवताओं की पूजा भगवान से उनके संबंध के कारण की जाती है। भगवान के संबंध के बिना, देवताओं की पूजा अनधिकृत (अविधी-पूर्वकम) है, जैसे कि किसी पेड़ की जड़ को पानी दिए बिना उसकी पत्तियों और शाखाओं को पानी देना अनुचित है। इसलिए देवता भी नारायण पर निर्भर हैं। लोक, या विभिन्न ग्रह, आकर्षक हैं क्योंकि उनके पास जीवन की विभिन्न किस्में और आनंद हैं जो आंशिक रूप से सच्चिदानंद विग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं। हर कोई आनंद और ज्ञान के अनन्त जीवन को चाहता है। भौतिक दुनिया में आनंद और ज्ञान का ऐसा शाश्वत जीवन उत्तरी ग्रहों में उत्तरोत्तर प्राप्त किया जाता है, लेकिन वहां पहुंचने के बाद व्यक्ति को वापस भगवद् प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की इच्छा होती है। जीवन की अवधि, आनंद और ज्ञान की आनुपातिक मात्रा के साथ, एक ग्रह से दूसरे ग्रह में बढ़ाई जा सकती है। विभिन्न ग्रहों में कोई जीवन की अवधि को हजारों और सैकड़ों हजारों वर्षों तक बढ़ा सकता है, लेकिन कहीं भी शाश्वत जीवन नहीं है। लेकिन जो ब्रह्मा के सर्वोच्च ग्रह तक पहुंच सकता है, वह आध्यात्मिक आकाश के ग्रहों तक पहुंचने की आकांक्षा कर सकता है, जहां जीवन शाश्वत है। इसलिए, एक ग्रह से दूसरे ग्रह की प्रगतिशील यात्रा भगवान के सर्वोच्च ग्रह (मद-धाम) तक पहुँचने में परिणत होती है, जहाँ जीवन शाश्वत और आनंद और ज्ञान से भरा होता है। भगवान नारायण को संतुष्ट करने के लिए सभी विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रदर्शन किया जाता है, ताकि उन तक पहुँचा जा सके, और कलियुग में सबसे अच्छा यज्ञ संकीर्तन-यज्ञ है, जो एक नारायण-परा भक्त की भक्ति सेवा का मुख्य आधार है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)