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bhagavat 2.4.9: परम पुरुषोत्तम भगवान एक हैं, फिर चाहे वे अकेले भौतिक प्रकृति के गुणों के साथ कार्य करते हों, या एक साथ कई रूपों में फैलते हों, या प्रकृति के गुणों का निर्देशन करने के लिए क्रमशः फैलते हों।   |   bhagavat अध्याय 2.4: सृष्टि का प्रक्रम   ।   bhagavat स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.4.9 
यथा गुणांस्तु प्रकृतेर्युगपत् क्रमशोऽपि वा ।
बिभर्ति भूरिशस्त्वेक: कुर्वन् कर्माणि जन्मभि: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
परम पुरुषोत्तम भगवान एक हैं, फिर चाहे वे अकेले भौतिक प्रकृति के गुणों के साथ कार्य करते हों, या एक साथ कई रूपों में फैलते हों, या प्रकृति के गुणों का निर्देशन करने के लिए क्रमशः फैलते हों।
 
The Supreme Personality of Godhead is one, whether He acts alone through the modes of nature or expands in many forms simultaneously or expands alternately to direct the modes of nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)