"रूस के प्रसिद्ध खगोल विज्ञान के प्रोफेसर बोरिस वोरोन्ट्सोव-वेलियामिनोव ने कहा कि ब्रह्मांड में ऐसे ग्रहों की अनंत संख्या होनी चाहिए जो बुद्धि से संपन्न प्राणियों द्वारा बसे हुए हैं।
"यह हो सकता है कि पृथ्वी पर जीवन ऐसे ग्रहों पर फलता-फूलता है।
"रसायन विज्ञान के डॉक्टर निकोलाई ज़िरोव ने अन्य ग्रहों पर वातावरण की समस्या को कवर करते हुए बताया कि एक मंगलवासी का जीव, उदाहरण के लिए, कम शरीर के तापमान के साथ सामान्य अस्तित्व के लिए खुद को बहुत अच्छी तरह से अनुकूलित कर सकता है।
"उन्होंने कहा कि उन्हें लगा कि मंगल ग्रह के वातावरण की गैसीय संरचना उन प्राणियों के जीवन को बनाए रखने के लिए काफी उपयुक्त है जो इसके अनुकूल हो गए हैं।" विभिन्न प्रकार के ग्रहों के लिए किसी जीव की इस अनुकूलन क्षमता को ब्रह्म-संहिता में विभूति-भिन्नम के रूप में वर्णित किया गया है; अर्थात्, ब्रह्मांड के भीतर असंख्य ग्रहों में से प्रत्येक एक विशेष प्रकार के वातावरण से संपन्न है, और वहाँ के जीव विज्ञान और मनोविज्ञान में बेहतर वातावरण के कारण अधिक उन्नत हैं। विभूति का अर्थ है "विशिष्ट शक्तियाँ," और भिन्नम का अर्थ है "रंग-बिरंगा।" जो वैज्ञानिक बाहरी अंतरिक्ष का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं और यांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा अन्य ग्रहों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें निश्चित रूप से पता होना चाहिए कि पृथ्वी के वायुमंडल के अनुकूल जीव अन्य ग्रहों के वायुमंडल में मौजूद नहीं हो सकते (अन्य ग्रहों की आसान यात्रा)। इसलिए, किसी को वर्तमान शरीर से मुक्त होने के बाद एक अलग ग्रह पर स्थानांतरित होने के लिए खुद को तैयार करना होगा, जैसा कि भगवद गीता (9.25) में कहा गया है:
यांति देवा-व्रता देवान
पितृन् यांति पितृ-व्रताः
भूतानि यांति भूतेज्या
यांति मद्-याजिनोऽपि माम्
"जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे, जो भूतों और आत्माओं की पूजा करते हैं वे ऐसे प्राणियों के बीच जन्म लेंगे, और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ रहेंगे।"
महाराज परीक्षित का प्रभु की सृजनात्मक ऊर्जा के कामकाज के बारे में कथन यह बताता है कि वह सृष्टि की प्रक्रिया की हर बात जानते थे। फिर उन्होंने शुकादेव गोस्वामी से ऐसी जानकारी क्यों पूछी? महाराज परीक्षित, एक महान सम्राट, पाण्डवों के वंशज और भगवान कृष्ण के महाभक्त होने के नाते, दुनिया के निर्माण के बारे में काफी कुछ जानने में सक्षम थे, लेकिन इतना ज्ञान पर्याप्त नहीं था। इसलिए उन्होंने कहा कि महानतम विद्वानों को भी इसके बारे में जानने में विफल रहते हैं, यहाँ तक कि महान प्रयास करने के बाद भी। प्रभु असीमित हैं, और उनकी गतिविधियाँ भी अथाह हैं। ज्ञान के सीमित स्रोत और अपूर्ण इंद्रियों के साथ, ब्रह्माजी तक का कोई भी जीवित प्राणी, ब्रह्मांड के भीतर का सबसे उच्च सिद्ध जीव कभी भी असीमित के बारे में जानने की कल्पना नहीं कर सकता। हम असीमित के बारे में कुछ जान सकते हैं जब इसे असीमित द्वारा समझाया गया है, जैसा कि स्वयं प्रभु ने भगवद-गीता के अनूठे वक्तव्यों में किया है, और इसे कुछ हद तक शुकादेव गोस्वामी जैसी साक्षात्कारित आत्माओं से भी जाना जा सकता है, जिन्होंने व्यासदेव से सीखा, एक शिष्य नारद, और इस प्रकार सिद्ध ज्ञान केवल शिष्य उत्तराधिकार की श्रृंखला द्वारा ही उतर सकता है, न कि किसी भी रूप में प्रायोगिक ज्ञान, पुराने या आधुनिक।
