ईश्वरः परमः कृष्णः
सच्चिदानन्दविग्रहः
अनादिर आदिर् गोविन्दः
सर्वकारणकारणम्
"भगवान के गुणों वाले कई व्यक्तित्व हैं, लेकिन कृष्ण सर्वोच्च हैं क्योंकि कोई भी उनसे आगे नहीं बढ़ सकता। वह परम पुरुष हैं, और उनका शरीर शाश्वत, ज्ञान और आनंद से पूर्ण है। वह आदि भगवान गोविंद हैं और सभी कारणों के कारण हैं।"
ब्रह्माजी स्वीकार करते हैं कि भगवान कृष्ण सभी कारणों का परम कारण हैं। लेकिन इस छोटे से ग्रह पृथ्वी के अंदर छोटे दिमाग वाले लोग भगवान को अपने जैसे समझते हैं। इस प्रकार जब भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि वह (भगवान कृष्ण) ही सब कुछ हैं तो सैद्धांतिक दार्शनिक और सांसारिक तर्क करने वाले उनका उपहास करते हैं और भगवान अफसोस के साथ कहते हैं:
अवजानन्ति मां मूढ़ा
मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानंतो
मम भूत-महेश्वरम।।
(भगवद-गीता ९.११)
ब्रह्मा और शिव (और अन्य देवताओं की तो बात ही क्या) भूत हैं, या शक्तिशाली सृजित देवता हैं जो सार्वभौमिक मामलों का प्रबंधन करते हैं, जैसे किसी राजा द्वारा नियुक्त मंत्री। मंत्री ईश्वर या नियंत्रक हो सकते हैं, लेकिन परम भगवान महेश्वर हैं, या नियंत्रकों के निर्माता। ज्ञान के कम भंडार वाले लोग यह नहीं जानते हैं और इसलिए उनमें उनका उपहास करने की दुस्साहस होती है क्योंकि वह कभी-कभी अपनी अकारण दया से हमारे सामने मानव के रूप में आते हैं। भगवान मनुष्य जैसे नहीं हैं। वह सच्चिदानंद-विग्रह हैं, या भगवान का निरपेक्ष व्यक्तित्व हैं और उनके शरीर और उनकी आत्मा के बीच कोई अंतर नहीं है। वह शक्ति और शक्तिशाली दोनों हैं।
महाराजा परीक्षित ने अपने आध्यात्मिक गुरु, शुकदेव गोस्वामी से, भगवान कृष्ण के वृंदावन में किए गए लीलाओं का वर्णन करने को नहीं कहा; वह पहले भगवान की सृष्टि के बारे में सुनना चाहते थे। शुकदेव गोस्वामी ने यह नहीं कहा कि राजा को भगवान के प्रत्यक्ष दिव्य लीलाओं के बारे में सुनना चाहिए। समय बहुत कम था, और स्वाभाविक रूप से शुकदेव गोस्वामी पूरी बात को छोटा करने के लिए सीधे दसवें स्कंध में जा सकते थे, जैसा कि आम तौर पर व्यावसायिक पाठ करने वाले करते हैं। लेकिन न तो राजा और न ही श्रीमद-भागवतम् के महान वक्ता भागवतम् के आयोजकों की तरह उछले; वे दोनों व्यवस्थित रूप से आगे बढ़े ताकि भविष्य के पाठक और श्रोता श्रीमद-भागवतम् के पाठ करने की प्रक्रिया के उदाहरण से सबक ले सकें। जो लोग भगवान की बाहरी शक्ति के नियंत्रण में हैं, या दूसरे शब्दों में जो लोग भौतिक दुनिया में हैं, उन्हें सबसे पहले यह जानना होगा कि भगवान की बाहरी शक्ति किस प्रकार परम व्यक्तित्व के निर्देशन में कार्य कर रही है और फिर हम उनकी आंतरिक ऊर्जा की गतिविधियों में प्रवेश करने का प्रयास कर सकते हैं। सांसारिक व्यक्ति ज्यादातर दुर्गा-देवी, कृष्ण की बाहरी ऊर्जा के उपासक होते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि दुर्गा-देवी भगवान की छाया ऊर्जा के अलावा कुछ नहीं है। भौतिक कार्य की उनकी आश्चर्यजनक प्रदर्शनी के पीछे भगवान का निर्देश है, जैसा कि भगवद-गीता (९.१०) में पुष्टि की गई है। ब्रह्म-संहिता पुष्टि करता है कि दुर्गा-शक्ति गोविंद के निर्देश द्वारा कार्य कर रही है और उनकी मंजूरी के बिना शक्तिशाली दुर्गा-शक्ति घास की एक तिनका भी नहीं हिला सकती है। इसलिए नवोदित भक्त, भगवान की आंतरिक ऊर्जा द्वारा प्रस्तुत दिव्य लीलाओं के मंच पर एक बार उछलने के बजाय, उनकी रचनात्मक ऊर्जा की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ करके जान सकते हैं कि परम भगवान कितने महान हैं। चैतन्य-चरितामृत में भी, रचनात्मक ऊर्जा और उसमें भगवान के हाथ का वर्णन किया गया है और चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने नवोदित भक्तों को कृष्ण के बारे में ज्ञान की उपेक्षा करने के खतरे के खिलाफ गंभीरता से सावधान रहने की चेतावनी दी है कि वह कितने महान हैं। केवल जब कोई भगवान कृष्ण की महानता को जानता है तो ही कोई उस पर अपना अविचल विश्वास दृढ़ता से रख सकता है; अन्यथा, आम आदमी की तरह, पुरुषों के महान नेता भी भगवान कृष्ण को कई देवताओं में से एक या एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व या केवल एक मिथक समझेंगे। वृंदावन में भगवान के दिव्य लीलाएं, या यहाँ तक कि द्वारका में भी, उन व्यक्तियों के लिए प्रिय हैं जो पहले से ही उन्नत आध्यात्मिक तकनीकों में खुद को योग्य बना चुके हैं और आम आदमी सेवा और पूछताछ की क्रमिक प्रक्रिया द्वारा इस तरह के तल पर प्राप्त करने में सक्षम हो सकते हैं जैसा हम देखेंगे महाराजा परीक्षित के व्यवहार में।
