"हे प्रिय भक्तों के प्रियतम भगवान कृष्ण, आप इस पूर्ण समर्पित दासी को गले लगा सकते हैं या अपने चरणों से मुझे कुचल सकते हैं, या आप मेरे सामने लंबे समय तक उपस्थित न होकर मेरे दिल को तोड़ सकते हैं, लेकिन फिर भी आप मेरे दिल के पूर्ण भगवान से कम नहीं हैं।"
श्रील रूप गोस्वामी ने भी इस तरह कहा है:
"हे गरीबों के स्वामी, आप मेरे साथ जो चाहें करें, मुझे दया दें या सज़ा दें, लेकिन इस दुनिया में आपके स्वामित्व के अलावा मेरा कोई नहीं है। चातक पक्षी हमेशा बादल से प्रार्थना करता है, भले ही वह बारिश बरसाता हो या तेज बिजली गिराता हो।"
भगवान चैतन्य के महान-आध्यात्मिक गुरु, श्रील माधवेंद्र पुरी ने निम्नलिखित शब्दों में सभी कर्म-कांडी दायित्वों से छुट्टी ले ली:
"हे मेरी संध्या प्रार्थना, तुम्हें शुभ हो। हे मेरे सुबह के स्नान, मैं तुम्हें अलविदा करता हूँ। हे देवताओं और पितरों, कृपया मुझे क्षमा करें। मैं आपकी खुशी के लिए और अधिक प्रसाद नहीं कर सकता। अब मैंने फैसला किया है कि मैं याद करके यदु के महान वंशज और कंस के महान दुश्मन [भगवान कृष्ण] को हर जगह मुक्त करूँगा। मुझे लगता है कि यह मेरे लिए पर्याप्त है। तो आगे के प्रयासों का क्या उपयोग है?"
श्रील माधवेंद्र पुरी ने आगे कहा:
"नीति में निपुण लोग मुझे मूर्ख कह सकते हैं, वैदिक लोग मुझे बार-बार भटका हुआ कह सकते हैं, मेरे रिश्तेदार मुझे मंद-बुद्धि और मेरे भाई मुझे मूर्ख कह सकते हैं, जो मोक्ष पाना चाहते हैं वे मुझे पागल कह सकते हैं जो बहुत अहंकारी है। लेकिन मेरा मन गोविंद के चरण-कमलों की चाहत को दूर करने में सक्षम नहीं है।"
"मुझे मायाग्रस्त होने का दोष कठोर नैतिकतावादी मुझ पर लगाएँ, मुझे इसकी परवाह नहीं। वैदिक कर्मकांडों के विशेषज्ञ मुझे भ्रम में पड़ा समझकर मुझे लांछित कर सकते हैं, मित्र-संबंधी मुझे निराश कह सकते हैं, भाई लोग मुझे मूर्ख कह सकते हैं, धनवान लालची लोग मुझे पागल बता सकते हैं और विद्वान दर्शनशास्त्री दावा कर सकते हैं कि मैं बहुत घमंडी हूं; फिर भी मेरे मन में भगवान गोविंद के चरणकमलों की सेवा करने के निश्चय से एक इंच भी कमी नहीं आती, यद्यपि मैं ऐसा करने में असमर्थ रहूं।"
और प्रल्हाद महाराज ने भी कहा था:
धर्मार्थकाम इति योऽभिहितस्त्रिवर्ग
ईक्षा त्रयी नयदमो विविधा च वार्ता
मन्ये तदेतदखिलं निगमस्य सत्यं
स्वात्मारपणं स्व-सुहृदः परमस्य पुंसः
"धर्म, अर्थ और काम को मोक्ष प्राप्ति के तीन साधनों के रूप में प्रसिद्ध किया जाता है। इनमें से, विशेष रूप से ईक्षा त्रयी, यानी आत्म-ज्ञान, काम्य कर्मों का ज्ञान और तर्क तथा राजनीति और अर्थशास्त्र भी आजीविका के विभिन्न साधन हैं। ये सभी वैदिक शिक्षा के विभिन्न विषय हैं, और इसलिए मैं उन्हें अस्थायी कार्यों के रूप में मानता हूं। दूसरी ओर, भगवान विष्णु के प्रति समर्पण जीवन में एक वास्तविक लाभ है, और मैं इसे परम सत्य मानता हूं।" (भागवत 7.6.26)
इस पूरे विषय का समापन भगवद्गीता (2.41) में व्यvasāyātmikā buddhiḥ, या पूर्णता का परम मार्ग के रूप में किया गया है। एक महान वैष्णव विद्वान श्री बलदेव विद्याभूषण इसे इस प्रकार परिभाषित करते हैं निष्काम-कर्मभिर्विशुद्ध चिताः—कामना रहित कर्मों के रूप में भगवान की दिव्य प्रेमल सेवा को प्रमुख कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना।
इसलिए महाराज परीक्षित बिल्कुल सही थे जब उन्होंने जीवन की सभी कर्मकांडीय धारणाओं को त्याग कर भगवान कृष्ण के चरणकमलों को दृढ़ता से स्वीकार किया था।
