श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.4.23 
भूतैर्महद्भिर्य इमा: पुरो विभु-
र्निर्माय शेते यदमूषु पूरुष: ।
भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मक:
सोऽलङ्‌कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
तत्वों द्वारा निर्मित शरीरों में अवस्थित तथा ब्रह्माण्ड में लेटे हुए, जो प्राणिमय बनाते हैं और जो अपने पुरुष-अवतार में जीव को भौतिक गुणों के सोलह विभागों को, जो जीव के जनक रूप हैं, अधीन करते हैं, वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मेरे प्रवचनों को अलंकृत करने के लिए अनुग्रह करें।
 
May the Supreme Personality of Godhead, who, lying within the universe, makes the bodies composed of elements full of life and who, in His male incarnation, subordinates the sixteen divisions of material modes, which are the generative forms of the living being, be pleased to embellish my discourses.
तात्पर्य
एक पूर्ण निरपेक्ष भक्त के रूप में, शुकादेव गोस्वामी (एक लौकिक व्यक्ति के विपरीत जो अपनी क्षमता पर गर्व करता है) भगवान के व्यक्तित्व की प्रसन्नता का आवाहन करते हैं ताकि उनके कथन सफल हो सकें और श्रोताओं द्वारा सराहे जा सकें। भक्त हमेशा अपने बारे में किसी भी सफलतापूर्वक किए गए काम के लिए एक साधन के रूप में सोचता है, और वह खुद द्वारा किए गए किसी भी काम का श्रेय लेने से इनकार करता है। ईश्वरविहीन नास्तिक गतिविधियों का सारा श्रेय लेना चाहता है, यह नहीं जानता कि एक घास का ब्लेड भी भगवान के व्यक्तित्व, सर्वोच्च आत्मा की स्वीकृति के बिना नहीं चल सकता। इसलिए शुकादेव गोस्वामी सर्वोच्च भगवान के निर्देश द्वारा आगे बढ़ना चाहते हैं, जिन्होंने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान बोलने के लिए प्रेरित किया था। वैदिक साहित्य में वर्णित सत्य लौकिक कल्पना के सिद्धांत नहीं हैं, और न ही वे काल्पनिक हैं, जैसा कि मनुष्यों का कम बुद्धिमान वर्ग कभी-कभी सोचता है। वैदिक सत्य तथ्यात्मक सत्य के सभी पूर्ण विवरण हैं, बिना किसी गलती या भ्रम के, और शुकादेव गोस्वामी सृजन की सच्चाई को दार्शनिक अटकलों के आध्यात्मिक सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि विषय के वास्तविक तथ्यों और आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, क्योंकि वह उसी तरह भगवान के द्वारा निर्देशित होंगे जैसे ब्रह्माजी को प्रेरित किया गया था। जैसा कि भगवद गीता (15.15) में कहा गया है, भगवान स्वयं वेदांत ज्ञान के पिता हैं, और केवल वही हैं जो वेदांत दर्शन के तथ्यात्मक अर्थ को जानते हैं। तो वेदों में वर्णित धर्म के सिद्धांतों से बड़ा कोई सत्य नहीं है। ऐसा वैदिक ज्ञान या धर्म शुकादेव गोस्वामी जैसे अधिकारियों द्वारा प्रसारित किया जाता है क्योंकि वह भगवान के एक विनम्र भक्तिपूर्ण सेवक हैं जिनकी बिना अधिकार के स्वयंभू व्याख्याकार बनने की कोई इच्छा नहीं है। वैदिक ज्ञान को समझाने का यही तरीका है, तकनीकी रूप से परंपरा प्रणाली या अवरोही प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति बिना गलती के देख सकता है कि कोई भी भौतिक रचना (चाहे वह किसी का अपना शरीर हो या कोई फल या फूल) आध्यात्मिक स्पर्श के बिना खूबसूरती से विकसित नहीं हो सकती है। दुनिया का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति या विज्ञान का सबसे महान व्यक्ति सब कुछ बहुत ही खूबसूरती से तभी प्रस्तुत कर सकता है जब तक कि आत्मा जीवन वहां है, या आध्यात्मिक स्पर्श वहां है। इसलिए सभी सत्यों का स्रोत सर्वोच्च आत्मा है, न कि स्थूल पदार्थ, जैसा कि स्थूल भौतिकवादी द्वारा गलत तरीके से माना गया है। हमें वैदिक साहित्य से जानकारी मिलती है कि भगवान ने सबसे पहले भौतिक ब्रह्मांड के शून्य में प्रवेश किया, और इस प्रकार सभी चीजें धीरे-धीरे एक के बाद एक विकसित हुईं। इसी तरह, भगवान प्रत्येक व्यक्तिगत प्राणी में स्थानीयकृत परमात्मा के रूप में स्थित हैं; इसलिए उनके द्वारा सब कुछ बहुत ही खूबसूरती से किया जाता है। सोलह प्रमुख रचनात्मक तत्व, जैसे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और ग्यारह इंद्रिय अंग, पहले स्वयं भगवान से विकसित हुए और इस तरह से जीवित संस्थाओं द्वारा साझा किए गए। इस प्रकार भौतिक तत्वों को जीवित संस्थाओं के आनंद के लिए बनाया गया था। इसलिए सभी भौतिक अभिव्यक्तियों के पीछे की खूबसूरत व्यवस्था भगवान की ऊर्जा द्वारा संभव बनाई गई है, और व्यक्तिगत जीवित संस्था केवल भगवान से इसे ठीक से समझने के लिए प्रार्थना कर सकती है। चूंकि भगवान, शुकादेव गोस्वामी से अलग, सर्वोच्च इकाई हैं, इसलिए प्रार्थना उन्हें अर्पित की जा सकती है। भगवान जीवित इकाई को भौतिक सृजन का आनंद लेने में मदद करते हैं, लेकिन वह इस तरह के झूठे आनंद से अलग हैं। शुकादेव न केवल सच्चाई को प्रस्तुत करने में व्यक्तिगत रूप से मदद करने के लिए, बल्कि दूसरों की मदद करने के लिए भी भगवान की दया की प्रार्थना करते हैं जिन्हें वह बोलना चाहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)