कृष्ण त्वदीय-पाद-पङ्कज-पंजरांतम
अद्यैव मे विशत मानस-राज-हंस:
प्राण-प्रयाण-समये कपहा-वात-पित्तैः
कंठावरोधन-विधौ स्मरणं कुतः ते
“हे प्रभु कृष्ण! मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि मेरे मनरूपी हंस को तुरंत आप चरण-कमलों की बेलों के पास जाकर उलझना चाहिए; क्योंकि यदि ऐसा न हुआ तो अंतिम श्वास के समय जब मेरा कंठ कफ, वायु और पित से बंद हो जाएगा, आपका स्मरण कैसे कर पाऊंगा?”
हंस और कमल की बेल के बीच बड़ा प्रिय संबंध है। अत: यह उपमा बड़ी उपयुक्त है कि हंस (परमहंस) बनने पर ही भगवान के चरण-कमलों की बेलों में प्रवेश किया जा सकता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि मानसिक विचारक, विद्वतापूर्ण ज्ञान के बल से भी अनंत काल तक विचार करते हुए भी परम सत्य के स्वरूप के सपने भी नहीं देख सकते। भगवान अपने को ऐसे मानसिक विचारकों के सामने प्रकट करने के अधिकार से वंचित रखते हैं। और इसीलिए क्योंकि वे भगवान के चरण-कमलों की बेलों में प्रवेश नहीं कर सकते, अत: सभी मानसिक विचारक निष्कर्षो में भिन्न होते हैं और अंत में वे अपनी रुचि के अनुसार “जितने निष्कर्ष, उतने ही मार्ग” (यथा-रुचम्) कह कर व्यर्थ समझौता कर लेते हैं। किंतु भगवान दुकानदार की तरह नहीं हैं जो कि मानसिक विचारकों के व्यापार-केन्द्र में सब प्रकार के ग्राहकों को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है। भगवान वही है जो वे हैं, ईश्वर का परम व्यक्तित्व और वे केवल उनको पूर्णरूपेण आत्मसमर्पण करने की मांग करते हैं। पर शुद्ध भक्त, पूर्व पूज्य आचार्यो या अधिकारियों के मार्ग का अनुसरण करते हुए, किसी योग्य आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम (अनुपश्यंति) से परम प्रभु के दर्शन कर सकता है। शुद्ध भक्त मानसिक विचार से प्रभु के दर्शन का प्रयत्न कभी नहीं करता, अपितु आचार्यों के पद-चिन्हों पर चलता है। ( महाजनो येन गतः स पंथाः )। अत: वैष्णव आचार्यों में प्रभु और भक्तों के विषय में निष्कर्षों का कोई भेद नहीं है। भगवान चैतन्य ने इस बात पर बल दिया है कि चेतन (जीव) सदा प्रभु का सेवक है और वह प्रभु के साथ-साथ एक और भिन्न भी है। भगवान चैतन्य का यह तत्व वैष्णव संप्रदायों में से सभी चारों (मोक्ष के पश्चात् भी प्रभु की शाश्वत सेवा स्वीकार करने वाले) में स्वीकृत है और कोई भी अधिकृत वैष्णव आचार्य ऐसा नहीं हो सकता जो स्वयं को प्रभु के समान समझे।
पवित्र भक्त की यह विनम्रता, जो एक-सौ प्रतिशत उनकी सेवा में समर्पित रहता है, भक्त को एक ऐसी समाधि में डाल देता है जिसके द्वारा वे हर चीज़ का एहसास कर सकते हैं, क्योंकि ईश्वर के ईमानदार भक्तों के लिए, ईश्वर स्वयं को प्रकट करते हैं, जैसा कि भगवद-गीता (10.10) में बताया गया है। भगवान, प्रत्येक व्यक्ति (यहाँ तक कि जो भक्त नहीं है) में बुद्धि के स्वामी होने के नाते, अपने भक्त को उचित बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे कि अपने आप ही पवित्र भक्त प्रभु और उनकी विभिन्न शक्तियों के बारे में वास्तविक सत्य से प्रबुद्ध हो जाते हैं। ईश्वर किसी की सट्टा शक्ति या निरपेक्ष सत्य पर मौखिक तर्क द्वारा प्रकट नहीं होते हैं; बल्कि, वे स्वयं को एक भक्त को तब प्रकट करते हैं जब वे भक्त के सेवा भाव से पूरी तरह संतुष्ट होते हैं। शुकदेव गोस्वामी एक मानसिक सट्टेबाज या सिद्धांत के समझौतावादी नहीं हैं कि "जितने रास्ते, उतने ही निष्कर्ष"; बल्कि, वह केवल प्रभु से प्रार्थना करते हैं, उनके दिव्य आनंद का आह्वान करते हैं। यही प्रभु को जानने का तरीका है।
