भगवद् गीता (3.10-11) में दी जानकारी के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने संवृत आत्माओं को ब्रह्माण्ड में पुनर्जन्म देने के बाद उन्हें यज्ञ करने और समृद्ध जीवन जीने का निर्देश दिया। ऐसे यज्ञ करने से संवृत आत्मायें कभी भी शरीर व आत्मा को साथ रखने में कठिनाई नहीं होगी। अंततः वे अपने अस्तित्व को शुद्ध कर सकते हैं। उन्हें आध्यात्मिक अस्तित्व में स्वाभाविक रूप से पदोन्नति मिलेगी, जो जीवित प्राणी की वास्तविक पहचान है। एक संवृत आत्मा को कभी भी बलिदान, दान और तपस्या के अभ्यास को किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसे सभी बलिदानों का उद्देश्य यज्ञ-पति, भगवान की व्यक्तित्व को खुश करना है; इसलिए भगवान प्रजा-पति भी हैं। कठ उपनिषद के अनुसार, एक भगवान असंख्य जीवित संस्थाओं के नेता हैं। भगवान द्वारा जीवित संस्थाओं का पालन-पोषण किया जाता है (एक बहुनां यो विदधाति कामन) इसलिए भगवान को सर्वोच्च भूत-भर्त या सभी जीवित प्राणियों का पालन-पोषण करने वाला कहा जाता है।
जीवित प्राणी अपनी पिछली गतिविधियों के संदर्भ में समानुपातिक रूप से बुद्धि से संपन्न होते हैं। सभी जीवित प्राणी एक समान बुद्धिमत्ता से संपन्न नहीं होते हैं, क्योंकि बुद्धिमत्ता के इस तरह के विकास के पीछे भगवान का नियंत्रण होता है, जैसा कि भगवद् गीता (15.15) में घोषित किया गया है। परमात्मा, अति आत्मा के रूप में, भगवान हर किसी के दिल में रहते हैं, और केवल उन्हीं से ही किसी की स्मरण शक्ति, ज्ञान और विस्मरण का पालन होता है (मत्त: स्मृतिर ज्ञानम अपोहनम च)। भगवान की कृपा से एक व्यक्ति अतीत की गतिविधियों को तेजी से याद कर सकता है जबकि अन्य नहीं कर सकते। भगवान की कृपा से एक अत्यधिक बुद्धिमान होता है, और वही नियंत्रण से एक मूर्ख होता है। इसलिए भगवान धियाम-पति या बुद्धि के भगवान हैं।
संवृत आत्माएँ भौतिक दुनिया की स्वामी बनने का प्रयास करती हैं। हर कोई अपनी उच्चतम डिग्री की बुद्धि को लागू करके भौतिक प्रकृति पर शासन करने की कोशिश कर रहा है। संवृत आत्मा द्वारा बुद्धिमत्ता का यह दुरुपयोग पागलपन कहलाता है। किसी की पूरी बुद्धि को भौतिक जकड़न से मुक्त होने के लिए लागू किया जाना चाहिए। लेकिन संवृत आत्मा, केवल पागलपन के कारण, अपनी पूरी ऊर्जा और बुद्धि को इंद्रिय संतुष्टि में लगाती है, और जीवन के इस अंत को प्राप्त करने के लिए वह जानबूझकर सभी प्रकार के कुकर्म करती है। परिणाम यह होता है कि पूर्ण स्वतंत्रता के बिना शर्त जीवन प्राप्त करने के बजाय, पागल संवृत आत्मा भौतिक शरीरों में विभिन्न प्रकार के बंधन में बार-बार उलझती रहती है। भौतिक अभिव्यक्ति में हम जो कुछ भी देखते हैं वह भगवान की ही रचना है। इसलिए वे संसारों में हर चीज के वास्तविक स्वामी हैं। संवृत आत्मा भगवान के नियंत्रण में इस भौतिक सृष्टि के एक अंश का आनंद ले सकती है, लेकिन आत्मनिर्भर नहीं हो सकती। यही ईशोपनिषद में निर्देश है। ब्रह्माण्ड के स्वामी द्वारा दिए गए चीजों से संतुष्ट होना चाहिए। यह केवल पागलपन से ही होता है कि कोई भौतिक संपत्ति के दूसरे हिस्से पर अतिक्रमण करने की कोशिश करता है।
संवृत आत्माओं पर अपनी बिन कारण की दया से, ब्रह्माण्ड का स्वामी अपनी ऊर्जा (आत्म-माया) द्वारा संवृत आत्माओं के साथ शाश्वत संबंध को फिर से स्थापित करने के लिए उतरता है। वह सभी को अपने नियंत्रण में एक निश्चित सीमा तक उपभोक्ता होने का झूठा दावा करने के बजाय आत्मसमर्पण करने का निर्देश देता है। जब वह उतरता है तो वह साबित करता है कि आनंद लेने की उसकी क्षमता कितनी अधिक है, और वह उदाहरण के लिए, एक साथ सोलह हजार पत्नियों से शादी करके अपनी आनंद की शक्ति प्रदर्शित करता है। संवृत आत्मा एक पत्नी का पति बनने पर भी बहुत गर्व करती है, लेकिन भगवान इस पर हंसते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति जान सकता है कि असली पति कौन है। तथ्य यह है कि भगवान अपनी रचना में सभी महिलाओं के पति हैं, लेकिन भगवान के नियंत्रण में एक संवृत आत्मा एक या दो पत्नियों का पति होने पर गर्व महसूस करती है।
इस श्लोक में उल्लिखित विभिन्न प्रकार के पति इस प्रकार सभी योग्यताएँ भगवान श्री कृष्ण के लिए हैं, और इसलिए श्री शुकादेव गोस्वामी ने यदु वंश के पति और गति का विशेष रूप से उल्लेख किया है। यदु वंश के सदस्य जानते थे कि भगवान श्री कृष्ण ही सब कुछ हैं, और उनका सभी का यही उद्देश्य था कि वे भगवान कृष्ण की पृथ्वी पर उनके दिव्य लीलाओं के समाप्त होने पर उनकी सेवा करें। भगवान की इच्छा से यदु वंश का विनाश इसिलए हुआ क्योंकि उनके सदस्यों को भगवान के साथ घर लौटना था। यदु वंश का विनाश एक भौतिक प्रदर्शन था जो कि भगवान ने रचाया था; अन्यथा भगवान और यदु वंश सदस्य सभी शाश्वत सहयोगी हैं। इसलिए भगवान सभी भक्तों के मार्गदर्शक हैं और जैसे शुकादेव गोस्वामी ने उन्हें प्रेमभाव भरे स्नेह के साथ अपना सम्मान अर्पित किया।
