श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.4.19 
स एष आत्मात्मवतामधीश्वर-
स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमय: ।
गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि-
र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान् प्रसीदताम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
वे परमात्मा और सम्पूर्ण आत्म-साक्षात्कार प्राप्त आत्माओं के परम श्रेष्ठ प्रभु हैं। वे वेदों, धार्मिक ग्रंथों और तपस्याओं के साक्षात् स्वरूप हैं। उनको भगवान ब्रह्मा, शिव और वे सभी पूजते हैं जो किसी भी प्रकार के ढोंग से परे हैं। श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजनीय होने के कारण, पूर्ण परमेश्वर मुझ पर प्रसन्न हों।
 
He is the Supreme Being and the Supreme Lord of all self-realized beings. He is the Vedas, religious texts (shastras) and austerities personified. He is worshipped by Brahma, Shiva and all persons without deceit. May the Supreme Being, who is worshipped with such wonder and respect, be pleased with me.
तात्पर्य
सर्वोच्च प्रभु, भगवान्, हालाँकि आत्म-साक्षात्कार के विभिन्न मार्गों के सभी अनुयायियों के स्वामी हैं, केवल उन लोगों द्वारा ही जाने जाते हैं जो सभी दंभों से ऊपर हैं। हर कोई शाश्वत शांति या शाश्वत जीवन की खोज में है, और इस गंतव्य के उद्देश्य से हर कोई या तो वैदिक धर्मग्रंथों या अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करता है या कठोर तपस्या से गुजरता है जैसे कि अनुभववादी दार्शनिक, रहस्यवादी योगी या निष्कपट भक्त आदि। लेकिन सर्वोच्च प्रभु केवल भक्तों द्वारा ही पूर्णतः प्राप्त किए जाते हैं क्योंकि वे सभी दिखावों से ऊपर हैं। जो लोग आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर हैं उन्हें आम तौर पर कर्मी, ज्ञानी, योगी या भगवान के भक्त के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। वैदिक अनुष्ठानों की फलदायी गतिविधियों से बहुत आकर्षित होने वाले कर्मी, भोगी-कामी कहलाते हैं, या जो भौतिक भोग की इच्छा रखते हैं। ज्ञानी, जो मानसिक अनुमान द्वारा सर्वोच्च के साथ एक होने की कोशिश करते हैं, मुक्ति-कामी कहलाते हैं, या जो भौतिक अस्तित्व से मुक्ति चाहते हैं। रहस्यमय योगी, जो भौतिक पूर्णता के आठ प्रकारों की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार की तपस्या का अभ्यास करते हैं और अंततः ट्रान्स में परमात्मा से मिलते हैं, उन्हें सिद्धि-कामी कहा जाता है, या जो सबसे अच्छे से बेहतर बनने, सबसे भारी से भारी बनने, हर इच्छित वस्तु प्राप्त करने, सब पर नियंत्रण रखने की इच्छा रखते हैं, अपनी पसंद की हर चीज बनाना आदि। ये सभी एक शक्तिशाली योगी की क्षमताएं हैं। लेकिन प्रभु के भक्त आत्म-संतुष्टि के लिए ऐसा कुछ नहीं चाहते हैं। वे केवल प्रभु की सेवा करना चाहते हैं क्योंकि भगवान महान हैं और जीवित संस्थाओं के रूप में वे शाश्वत रूप से भगवान के अधीनस्थ भाग और पार्सल हैं। भक्त द्वारा स्वयं की यह पूर्ण प्राप्ति उसे इच्छाहीन बनने में मदद करती है, अपने निजी स्व के लिए कुछ भी नहीं चाहती है, और इस प्रकार भक्तों को निष्कामी कहा जाता है, बिना किसी इच्छा के। एक जीवित प्राणी, अपनी संवैधानिक स्थिति से, सभी इच्छाओं से रहित नहीं हो सकता (भोगी-कामी, मुक्ति-कामी और सिद्धि-कामी सभी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए कुछ चाहते हैं), लेकिन भगवान के निष्कामी भक्त भगवान की संतुष्टि के लिए सब कुछ चाहते हैं। वे प्रभु के आदेशों पर पूरी तरह निर्भर होते हैं और प्रभु की संतुष्टि के लिए अपना कर्तव्य निभाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। शुरू में अर्जुन ने खुद को उन लोगों में से एक के रूप में रखा जो आत्म-संतुष्टि चाहते हैं, क्योंकि वह कुरुक्षेत्र की लड़ाई में नहीं लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें इच्छाहीन बनाने के लिए भगवान ने भगवद-गीता का उपदेश दिया, जिसमें कर्म-योग, ज्ञान-योग, हठ-योग और भक्ति-योग के तरीके भी बताए गए थे। क्योंकि अर्जुन बिना किसी दिखावे के थे, उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और लड़ने के लिए सहमति (करिष्ये वचनं तव) द्वारा प्रभु को संतुष्ट किया, और इस तरह वह इच्छाहीन हो गया। ब्रह्मा और भगवान शिव के उदाहरणों का यहाँ विशेष रूप से उद्धरण दिया गया है क्योंकि ब्रह्माजी, भगवान शिव, श्रीमती लक्ष्मीजी और चार कुमार (सनक, सनातन आदि) चार कामना रहित वैष्णव संप्रदायों के नेता हैं। वे सभी सभी दंभों से मुक्त हैं। श्रील जीव गोस्वामी ने गत-व्यालीकैः शब्द की व्याख्या प्रोज्जिता-कैतवैः के रूप में की है, या जो सभी दिखावों से मुक्त हैं (केवल निष्कपट भक्त)। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 19.149) में कहा गया है: कृष्ण-भक्त - निष्काम, अतः एव 'शांत' भोगी-मुक्ति-सिद्धि-कामी, सकली 'अशांत'

वे जो अपनी पवित्र गतिविधियों से फल प्राप्त करना चाहते हैं, जो मोक्ष और परम के साथ एकता की इच्छा रखते हैं, और जो रहस्यवादी शक्ति की भौतिक पूर्णता की इच्छा रखते हैं, सभी बेचैन हैं क्योंकि वे अपने लिए कुछ चाहते हैं, लेकिन भक्त पूरी तरह से शांत है क्योंकि उसे खुद के लिए कोई मांग नहीं है और वह हमेशा प्रभु की इच्छा की सेवा के लिए तैयार रहता है। निष्कर्ष इसलिए है, कि प्रभु सभी के लिए है क्योंकि कोई भी अपनी इच्छाओं के परिणाम को उनकी स्वीकृति के बिना प्राप्त नहीं कर सकता है, लेकिन जैसा कि भगवद-गीता (8.9) में भगवान द्वारा बताया गया है, ऐसे सभी परिणाम केवल उन्हीं द्वारा दिए जाते हैं, क्योंकि प्रभु सभी का (मूल नियंत्रक) हैं, अर्थात् वेदांती, महान कर्म-कांडी, महान धार्मिक नेता, तपस्या करने वाले और वे सभी जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन अंततः उनका साक्षात्कार केवल निरर्थक भक्तों द्वारा ही किया जाता है। इसलिए भगवान की भक्ति सेवा पर श्रील शुकदेव गोस्वामी द्वारा विशेष बल दिया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)