हूण: पूर्वी जर्मनी का क्षेत्र और रूस का हिस्सा हूणों के प्रांत के रूप में जाना जाता है। तदनुसार, कभी-कभी एक प्रकार की पहाड़ी जनजाति को हूण के रूप में जाना जाता है।
आंध्र: महाभारत के भीष्म पर्व में उल्लिखित दक्षिणी भारत का एक प्रांत। यह अभी भी उसी नाम से विद्यमान है।
पुलिंद: यह महाभारत (आदि-पर्व 174.38) में उल्लिखित है, अर्थात पुलिंद नाम के प्रांत के निवासी। इस देश को भीमसेन और सहदेव ने जीत लिया था। यूनानियों को पुलिंद के रूप में जाना जाता है, और महाभारत के वन-पर्व में उल्लेख किया गया है कि दुनिया के इस हिस्से की गैर-वैदिक जाति दुनिया पर राज करेगी। यह पुलिंद प्रांत भी भारत के प्रांतों में से एक था, और निवासियों को क्षत्रिय राजाओं में वर्गीकृत किया गया था। लेकिन बाद में, ब्राह्मणवादी संस्कृति को त्यागने के कारण, उन्हें म्लेच्छ (ठीक वैसे ही जैसे जो लोग इस्लामी संस्कृति के अनुयायी नहीं हैं उन्हें काफिर कहा जाता है और जो लोग ईसाई संस्कृति के अनुयायी नहीं हैं उन्हें हीथेन कहा जाता है) के रूप में उल्लेख किया गया था।
आभीर: यह नाम महाभारत में, सबा-पर्व और भीष्म-पर्व दोनों में भी आता है। यह उल्लेख किया गया है कि यह प्रांत सिंध में सरस्वती नदी पर स्थित था। आधुनिक सिंध प्रांत पूर्व में अरब सागर के दूसरी तरफ तक फैला हुआ था, और उस प्रांत के सभी निवासियों को आभीरों के रूप में जाना जाता था। वे महाराज युधिष्ठिर के वर्चस्व में थे, और मार्कंडेय के कथनों के अनुसार दुनिया के इस हिस्से के म्लेच्छ भी भारत पर राज करेंगे। बाद में यह सच साबित हुआ, जैसा कि पुलिंदों के मामले में था। पुलिंदों की ओर से, सिकंदर महान ने भारत पर विजय प्राप्त की, और आभीरों की ओर से, मुहम्मद गोरी ने भारत पर विजय प्राप्त की। ये आभीर भी पहले ब्राह्मण संस्कृति के भीतर क्षत्रिय थे, लेकिन उन्होंने संबंध छोड़ दिया। जो क्षत्रिय परशुराम से डरते थे और काकेशस पहाड़ी क्षेत्रों में छिप गए थे, बाद में उन्हें आभीर के रूप में जाना जाने लगा, और जिस स्थान पर वे रहते थे उसे आभीरदेश के रूप में जाना जाता था।
शुंभ या कांग: महाभारत में वर्णित पुराने भारत के कांग प्रांत के निवासी।
यवन: यवन महाराज ययाति के पुत्रों में से एक का नाम था जिसे शासन करने के लिए तुर्की के रूप में जाने वाली दुनिया का हिस्सा दिया गया था। इसलिए महाराजा यवन के वंशज होने के कारण तुर्क यवन हैं। इसलिए यवन क्षत्रिय थे, और बाद में, ब्राह्मण संस्कृति को छोड़कर, वे म्लेच्छ-यवन बन गए। यवनों का वर्णन महाभारत (आदि-पर्व 85.34) में है। तुर्वसु नामक एक अन्य राजकुमार को भी यवन के रूप में जाना जाता था, और उनके देश को पांडवों में से एक सहदेव ने जीत लिया था। पश्चिमी यवन कर्ण के दबाव में कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के साथ शामिल हुए। यह भी भविष्यवाणी की गई थी कि ये यवन भी भारत पर विजय प्राप्त करेंगे, और यह सच साबित हुआ।
खस: खसदेश के निवासियों का उल्लेख महाभारत (द्रोण-पर्व) में है। जिनके ऊपरी होंठ पर बालों की वृद्धि अवरुद्ध होती है उन्हें आम तौर पर खस कहा जाता है। जैसे, खस मंगोल, चीनी और अन्य हैं जिन्हें ऐसा नामित किया गया है।
ऊपर बताए गए ऐतिहासिक नाम दुनिया के अलग राष्ट्र हैं। वे लोग भी जो लगातार पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं, अगर वो भगवान के भक्त की शरण लेते हैं तो वो सभी सही मानवता के संभावित हैं। यीशु क्राइस्ट और मुहम्मद, ईश्वर की दो शक्तिशाली भक्त, ने दुनिया की सतह पर ईश्वर के स्थान पर अद्भुत सेवा की। और श्रील शुकदेव गोस्वामी जी के कथन से मालूम होता है कि दुनिया के वर्तमान समय में ईश्वर विहीन सभ्यता को चलाने के बजाय, अगर दुनिया के मामलों का नेतृत्व ईश्वर के भक्तों को सौंपा जाए, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के नाम और शैली के अंतर्गत पहले ही एक दुनियाभर का संघठन शुरू किया जा चुका है, तो सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृपा से पूरी दुनिया के इंसानों के दिलों में गहरा परिवर्तन आ सकता है क्योंकि ईश्वर के भक्त लोगों के धूल धूसरित दिमाग को पवित्र कर ऐसे परिवर्तन को प्रभावित करने के लिए सक्षम अधिकारी हैं। दुनिया के नेता अपने अपने पदों पर बने रह सकते हैं क्योंकि ईश्वर के शुद्ध भक्त राजनीतिक नेतृत्व या कूटनयिक निहितार्थों में रुचि नहीं रखते हैं। भक्त बस यही देखने में रुचि रखते हैं कि राजनीतिक प्रचार की वजह से आम लोगों को गुमराह न किया जाए और किसी इंसान का मूल्यवान जीवन ऐसे सभ्यता का अनुसरण करने में बर्बाद न किया जाए जो आखिर में बर्बाद हो जाती है। अगर इसलिए राजनीतिज्ञ भक्तों की अच्छी सलाह को मानें तो दुनिया की स्थिति में निश्चित रूप से बहुत बड़ा बदलाव आएगा जैसे कि भक्तों के पवित्र प्रचार के द्वारा भगवान चैतन्य ने दिखाया था। जैसे शुकादेव गोस्वामी जी ने अपने प्रार्थना की शुरुआत यत-कीर्तनम शब्द पर चर्चा करके की थी, उसी तरह भगवान चैतन्य ने सलाह दी थी कि सिर्फ भगवान के पवित्र नाम का महिमामंडन करने से ही दिल में बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है जिससे राजनीतिज्ञों की वजह से इंसानी जातियों के बीच की पूरी गलतफहमी तुरंत खत्म हो सकती है। और गलतफहमी की आग के खत्म होने के बाद दूसरे फायदे भी होंगे। मंजिल अपने घर वापस जाना है, अपने भगवान के पास, जैसा हमने कई बार इन पन्नों पर बताया है।
भक्ति पंथ के अनुसार, जिसे सामान्यतः वैष्णव पंथ के रूप में जाना जाता है, ईश्वर प्राप्ति के मामले में किसी के आगे बढ़ने पर कोई रोक नहीं है। जैसा की ऊपर उल्लेख किया गया है, किरात आदि को भी वैष्णव एक वैष्णव में परिवर्तित कर सकता है। भगवद गीता (9.32) में भगवान द्वारा यह कहा गया है कि भगवान के भक्त बनने के लिए कोई रोक नहीं है (यहाँ तक कि उन नीच जाति वालों के लिए और जो स्त्री, शूद्र अथवा वैश्य है) और एक भक्त बनकर प्रत्येक व्यक्ति अपने घर लौटने के योग्य होता है, वापस भगवान के पास। एकमात्र योग्यता यह है कि व्यक्ति भगवान के एक शुद्ध भक्त का आश्रय ले, जिसके पास श्री कृष्ण के पारलौकिक विज्ञान (भगवद गीता और श्रीमद् भागवत) का सम्पूर्ण ज्ञान है। दुनिया के किसी भी हिस्से से कोई भी व्यक्ति जो श्री कृष्ण के विज्ञान में अच्छी तरह से निपुण हो जाता है, वह एक शुद्ध भक्त और सामान्य लोगों के लिए एक आध्यात्मिक गुरु बन जाता है और उन्हें हृदय शुद्ध करके पुनः प्राप्त कर सकता है। भले ही कोई व्यक्ति सबसे अधिक पापी व्यक्ति क्यों न हो, वह एक शुद्ध वैष्णव के साथ व्यवस्थित संपर्क द्वारा एक बार में शुद्ध हो सकता है। इसलिए, एक वैष्णव जाति और पंथ के किसी भी विचार के बिना, दुनिया के किसी भी हिस्से से एक वास्तविक शिष्य स्वीकार कर सकता है और उसे नियमित सिद्धांतों द्वारा एक शुद्ध वैष्णव की स्थिति में पदोन्नत कर सकता है, जो ब्राह्मणिक संस्कृति से परे है। जाति या वर्णाश्रम-धर्म की प्रणाली, प्रणाली के तथाकथित अनुयायियों के बीच भी अब नियमित नहीं है। न ही सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के वर्तमान संदर्भ में संस्थागत कार्य को फिर से स्थापित करना अब संभव है। किसी देश के विशेष रिवाज के संदर्भ के बिना, किसी को आध्यात्मिक रूप से वैष्णव पंथ में स्वीकार किया जा सकता है, और पारलौकिक प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश से, श्रीमद्भागवत अथवा भगवद-गीता के पंथ का प्रचार पूरे विश्व में किया जा सकता है, पारलौकिक पंथ को स्वीकार करने के इच्छुक सभी व्यक्तियों को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। भक्तों द्वारा इस तरह का सांस्कृतिक प्रचार निश्चित रूप से उन सभी व्यक्तियों द्वारा स्वीकार किया जाएगा जो देश के रिवाज के लिए किसी विशेष पक्षपात के बिना तर्कसंगत और जिज्ञासु हैं। एक वैष्णव कभी भी किसी दूसरे वैष्णव को जन्मसिद्ध अधिकार के आधार पर स्वीकार नहीं करता, जैसे की वह कभी भी मंदिर में भगवान के देवता को मूर्ति के रूप में नहीं सोचता। और इस संबंध में सभी संदेहों को दूर करने के लिए, श्रील शुकदेव गोस्वामी ने भगवान के आशीर्वाद का आह्वान किया है, जो सर्वशक्तिमान हैं (प्रभावीष्णवे नमः)। जैसा कि सर्वशक्तिमान भगवान अपने भक्त की विनम्र सेवा को अर्चना की भक्तिमय गतिविधियों में, मंदिर में पूजा करने योग्य देवता के रूप में अपने रूप को, उसी प्रकार एक शुद्ध वैष्णव का शरीर अपने आप को एक बार में पारलौकिक रूप से बदल देता है जब वह खुद को भगवान की सेवा में समर्पित करता है और एक योग्य वैष्णव द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। इस संबंध में वैष्णव विनियम का आदेश इस प्रकार है: आर्छे विष्णौ शिला-धीर गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाती-बुद्धिः श्री-विष्णोर नामनी शब्द-साधारण्य-बुद्धिः, आदि। "मंदिर में पूजे जाने वाले भगवान के देवता को मूर्ति नहीं मानना चाहिए, और न ही अधिकृत आध्यात्मिक गुरु को एक साधारण व्यक्ति समझना चाहिए। और न ही एक शुद्ध वैष्णव को एक विशेष जाति का होना चाहिए।" (पद्म पुराण) निष्कर्ष यह है कि, भगवान सर्वशक्तिमान होने के कारण, किसी भी परिस्थिति में, दुनिया के किसी भी हिस्से से, व्यक्तिगत रूप से या आध्यात्मिक गुरु के रूप में अपने वास्तविक प्रकटीकरण के माध्यम से किसी को भी स्वीकार कर सकते हैं। भगवान चैतन्य ने वर्णाश्रमियों के अलावा समुदायों से कई भक्तों को स्वीकार किया, और उन्होंने हमें सिखाने के लिए खुद घोषित किया कि वह जीवन की किसी जाति या सामाजिक व्यवस्था से संबंधित नहीं हैं, लेकिन वह भगवान के उस सेवक के शाश्वत सेवक हैं जो वृंदावन की दामिनियों (भगवान कृष्ण) की सेवा करते हैं। वही आत्म-अनुभूति का मार्ग है।
