विचक्षणा यच्चरणोपसादनात्
सङ्गं व्युदस्योभयतोऽन्तरात्मन: ।
विन्दन्ति हि ब्रह्मगतिं गतक्लमा-
स्तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नम: ॥ १६ ॥
अनुवाद
मैं बार-बार सभी मंगलों के धनी भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करूँ। उच्चतम श्रेणी के बुद्धिमान लोग भी उनके चरण-कमलों की शरण ग्रहण करके वर्तमान और भावी जन्मों में सभी आसक्तियों से मुक्त हो जाते हैं और बिना किसी कठिनाई के आध्यात्मिक जगत की ओर बढ़ते हैं।
I repeatedly offer my obeisances unto the all-auspicious Lord Sri Krishna. By simply taking refuge in His lotus feet, highly intelligent persons are relieved of all attachments of the present and future world and advance towards the spiritual world without any difficulty.
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बार-बार या इस मामले में हर किसी को निर्देश दिया है जो उनके अद्वितीय भक्त बनने के लिए संबंधित है। भगवद-गीता में उनके निर्देश के अंतिम चरण में (18.64-66) उन्होंने सबसे भरोसेमंद तरीके से निम्नलिखित निर्देश दिया: सर्व-गुह्यातमं भूयः, शृणु मे परमं वचः, इष्टो असि मे दृढमिति, ततो वक्ष्यामि ते हितम, मन-मना भव मद्-भक्तो, मद्-याजी माम नमस्करु, माम एवैषि सत्यं ते, प्रतिजाने प्रियो असि मे, सर्व-धर्मान् परित्यज्य, माम एकं शरणं व्रज, अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: "प्यारे अर्जुन, तुम मुझे बहुत प्रिय हो और इसलिए सिर्फ तुम्हारे भले के लिए मैं अपने निर्देशों का सबसे गुप्त भाग बताऊंगा। यह बस यह है: मेरे शुद्ध भक्त बनो और सिर्फ मुझे ही अपना समर्पण करो, और मैं तुम्हें पूर्ण आध्यात्मिक अस्तित्व का वादा करता हूं, जिसके द्वारा तुम मेरे लिए असीम प्रेमी सेवा के अधिकार को प्राप्त कर सकते हो। बस धार्मिकता के सभी दूसरे रास्ते छोड़ दो और मुझे एकाधिकार से समर्पण कर दो और विश्वास करो कि मैं तुम्हें तुम्हारे पापकर्मों से बचाऊंगा और मैं तुम्हें मुक्ति दूंगा। अब और चिंता मत करो। जो लोग बुद्धिमान है वे भगवान के इस अंतिम निर्देश पर गंभीर ध्यान देते हैं। आध्यात्मिक प्राप्ति में आत्म का ज्ञान पहला कदम है, जिसे गोपनीय ज्ञान कहा जाता है, और उसके एक कदम आगे भगवान की प्राप्ति है, जिसे और अधिक गोपनीय ज्ञान कहा जाता है। भगवद-गीता के ज्ञान की परिणति भगवान की प्राप्ति है, और जब कोई भगवान प्राप्ति की इस अवस्था को प्राप्त करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से, श्रद्धा से भगवान का भक्त बन जाता है और उसे प्रेममय असीम सेवा अर्पित करता है। भगवान के लिए यह भक्तिमय सेवा हमेशा भगवान के प्रेम पर आधारित होती है और नियमित सेवा की प्रकृति से अलग होती है जैसा कि कर्म-योग, ज्ञान-योग या ध्यान-योग में निश्चित किया गया है। भगवद-गीता में ऐसी विभिन्न श्रेणियों के पुरुषों के लिए विभिन्न निर्देश हैं और वर्णाश्रम-धर्म, संन्यास-धर्म, यति-धर्म, जीवन पद्धति का त्याग, इंद्रियों पर नियंत्रण, ध्यान, रहस्यमयी शक्तियों की पूर्णता, इत्यादि के लिए कई विवरण हैं। लेकिन जो लोग श्रद्धा से भगवान की सेवा करने के लिए स्वतःस्फूर्त प्रेम से भगवान को पूरी तरह से समर्पण करते हैं, वे वास्तव में वेदों में बताए गए सभी ज्ञान का सार अपने आप में समाहित कर लेते हैं। जो कोई भी इस विधि को बहुत चतुराई से अपनाता है वह तुरंत जीवन की पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। और मानव जीवन की इस पूर्णता को ब्रह्म-गति कहा जाता है, या आध्यात्मिक अस्तित्व में प्रगतिशील मार्च। जैसा कि वैदिक आश्वासन के आधार पर श्रील जीवा गोस्वामी ने कहा है, ब्रह्म-गति का अर्थ है भगवान के समान एक आध्यात्मिक रूप को प्राप्त करना, और उस रूप में मुक्त जीवित प्राणी आध्यात्मिक आकाश में स्थित आध्यात्मिक ग्रहों में से एक पर हमेशा के लिए रहता है। जीवन की इस पूर्णता को प्राप्त करना भगवान के एक शुद्ध भक्त के लिए आसानी से उपलब्ध है बिना पूर्णता के किसी भी कठिन तरीके से गुजरे। इस तरह की भक्तिमय जिंदगी कीर्तन, स्मरण, ईक्षण आदि से भरी हुई होती है, जैसा कि पिछले श्लोक में बताया गया है। इसलिए किसी भी हिस्से में मानव जीवन के किसी भी श्रेणी में उपलब्ध सबसे बड़ी पूर्णता को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को भक्तिमय जीवन के इस सरल रास्ते को अपनाना चाहिए। जब भगवान ब्रह्मा वृंदावन में एक चंचल बच्चे के रूप में भगवान कृष्ण से मिले, तो उन्होंने उनकी प्रार्थना की जिसमें उन्होंने कहा: श्रेयः-सृतिं भक्तिं उदास्य ते विभो, क्लिश्यंति ये केवल-बोध-लब्धये, तेषां असौ क्लेशल एव शिष्यते, नान्यद यथा स्थूल-तुषावघातनाम, ( भागवतम् 10.14.4) बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा बड़ी मात्रा में आध्यात्मिक गतिविधियों को करने के बदले में प्राप्त की जाने वाली पूर्णता का सबसे ऊंचा गुण भक्ति-योग है। यहां दिया गया उदाहरण बहुत उपयुक्त है। मुट्ठी भर असली धान बिना किसी पदार्थ वाली भूसी के ढेर से ज्यादा मूल्यवान है। इसी तरह, किसी को भी कर्म-कांड या ज्ञान-कांड या योग के व्यायाम प्रदर्शन से आकर्षित नहीं होना चाहिए, बल्कि एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के अधीन कीर्तन, स्मरण, आदि के सरल प्रदर्शन को चतुराई से लेना चाहिए, और बिना किसी कठिनाई के सबसे बड़ी पूर्णता को प्राप्त करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥