अस्तित्व की परमहंस अवस्था आध्यात्मिक मूल्यों की उच्चतम पूर्णता की अवस्था है। श्रीमती कुंतीदेवी के अनुसार, भगवान को तथ्यतः केवल परमहंसों द्वारा ही समझा जाता है। जैसे अवैयक्तिक ब्रह्म से स्थानीयकृत परमात्मा से भगवद रूप तक, पुरुषोत्तम, भगवान कृष्ण, के लिए श्रेष्ठता की क्रमिक प्राप्ति है, इसी प्रकार सन्यास के आध्यात्मिक जीवन में किसी की स्थिति का क्रमिक प्रचार है। कुटी चक्र, बहुदक, परिव्राजकाचार्य और परमहंस, जीवन के त्यागी क्रम, सन्यास, और पांडवों की माता, रानी कुंतीदेवी ने भगवान कृष्ण के लिए प्रार्थना में उनके बारे में बताया है (खंड एक, अध्याय आठ)। परमहंस आम तौर पर अवैयक्तिकतावादियों और भक्तों दोनों के बीच पाए जाते हैं, लेकिन श्रीमद-भागवतम (जैसा कि कुंतीदेवी द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया है) के अनुसार, शुद्ध भक्ति-योग को परमहंसों द्वारा समझा जाता है, और कुंतीदेवी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भगवान अवतरित होते हैं (परित्राणाय साधुनम) विशेष रूप से परमहंसों को भक्ति-योग प्रदान करने के लिए। इसलिए अंततः परमहंस, इस शब्द के वास्तविक अर्थ में, भगवान के निष्कपट भक्त हैं। श्रील जीवा गोस्वामी ने सीधे स्वीकार किया है कि उच्चतम गंतव्य भक्ति-योग है, जिसके द्वारा कोई भगवान की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा को स्वीकार करता है। जो भक्ति-योग के मार्ग को स्वीकार करते हैं, वे तथ्यात्मक परमहंस हैं।
चूंकि भगवान सभी के प्रति बहुत दयालु हैं, अवैयक्तिकतावादी, जो भगवान के अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति में अस्तित्व में विलय होने के साधन के रूप में भक्ति को स्वीकार करते हैं, उन्हें भी उनके वांछित गंतव्य से सम्मानित किया जाता है। भगवद-गीता (4.11) में उन्होंने सभी को आश्वासन दिया है: ये यथा माम प्रपद्यन्ते। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, परमहंसों के दो वर्ग हैं, अर्थात् ब्रह्मानंद (अवैयक्तिकतावादी) और प्रेमानंद (भक्त), और दोनों को उनके वांछित गंतव्य प्रदान किए जाते हैं, हालांकि प्रेमानंद ब्रह्मानंद की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं। लेकिन ब्रह्मानंद और प्रेमानंद दोनों ही पारलौकिकतावादी हैं, और उनका जीवन की अस्तित्वगत पीड़ाओं से भरे हीन, भौतिक प्रकृति से कोई लेना-देना नहीं है।
