श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.4.13 
भूयो नम: सद्वृजिनच्छिदेऽसता-
मसम्भवायाखिलसत्त्वमूर्तये ।
पुंसां पुन: पारमहंस्य आश्रमे
व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
मैं पुनः पूर्ण अस्तित्व और पारमार्थिक रूप वाले भगवान को नमन करता हूं, जो पवित्र भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले हैं और नास्तिक प्रवृत्ति वाले राक्षसों के निरंकुशता का विनाश करने वाले हैं। जो परम आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त योगियों को उनके विशिष्ट स्थान प्रदान करने वाले हैं।
 
I once again offer my respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who is the personification of the universe and the personification of the spiritual self, who liberates the pious devotees from all troubles and who destroys the growth of the atheistic attitude of the nondevotee demons. He is the one who grants the Yogis their special position, who have attained the highest spiritual perfection.
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण सभी अस्तित्वों के पूर्ण रूप हैं, भौतिक और आध्यात्मिक दोनों। अखिल का अर्थ है पूर्ण, या वह जो खिल नहीं है, हीन नहीं है। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, दो प्रकार के स्वरूप (प्रकृति) होते हैं, अर्थात् भौतिक स्वरूप और आध्यात्मिक स्वरूप, या भगवान की बाहरी और आंतरिक शक्तियाँ। भौतिक प्रकृति को अपर या नीच कहा जाता है, और आध्यात्मिक प्रकृति को श्रेष्ठ या पारलौकिक कहा जाता है। इसलिए प्रभु का रूप हीन, भौतिक प्रकृति का नहीं है। वह पूर्ण विलक्षणता हैं। और वह मूर्ति हैं, या पारलौकिक रूप हैं। कम बुद्धिमान व्यक्ति, जो उनके पारलौकिक रूप से अनजान हैं, उन्हें अवैयक्तिक ब्रह्म के रूप में वर्णित करते हैं। लेकिन ब्रह्म केवल उनके पारलौकिक शरीर (यस्य प्रभा) की किरणें हैं। भक्त, जो उनके पारलौकिक रूप से अवगत हैं, उनकी सेवा करते हैं; इसलिए प्रभु भी अपनी अकारण दया से उनका प्रतिदान करते हैं और इस प्रकार अपने भक्तों को सभी संकटों से मुक्त करते हैं। वे धर्मपरायण व्यक्ति जो वेद के विधानों का पालन करते हैं, वे भी उन्हें प्रिय हैं, और इसलिए इस दुनिया के पवित्र पुरुष भी उनके द्वारा संरक्षित हैं। अधर्मी और अधर्मी वेद के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं, और इसलिए ऐसे व्यक्ति हमेशा अपनी कुत्सित गतिविधियों में उन्नति करने से बाधित रहते हैं। उनमें से कुछ, जो विशेष रूप से प्रभु द्वारा अनुग्रहित हैं, उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से मारे जाते हैं, जैसे कि रावण, हिरण्यकशिपु और कंस के मामले में, और इस प्रकार ऐसे राक्षसों को मुक्ति मिल जाती है और इस तरह उनकी राक्षसी गतिविधियों में आगे की प्रगति से रोक लगा दी जाती है। जैसे एक दयालु पिता, या तो भक्तों पर उनके पक्ष में या राक्षसों को उनकी सज़ा स्वरूप वह सदैव सभी के प्रति दयालु हैं क्योंकि वह सभी व्यक्तिगत अस्तित्वों के लिए पूर्ण अस्तित्व है।

अस्तित्व की परमहंस अवस्था आध्यात्मिक मूल्यों की उच्चतम पूर्णता की अवस्था है। श्रीमती कुंतीदेवी के अनुसार, भगवान को तथ्यतः केवल परमहंसों द्वारा ही समझा जाता है। जैसे अवैयक्तिक ब्रह्म से स्थानीयकृत परमात्मा से भगवद रूप तक, पुरुषोत्तम, भगवान कृष्ण, के लिए श्रेष्ठता की क्रमिक प्राप्ति है, इसी प्रकार सन्यास के आध्यात्मिक जीवन में किसी की स्थिति का क्रमिक प्रचार है। कुटी चक्र, बहुदक, परिव्राजकाचार्य और परमहंस, जीवन के त्यागी क्रम, सन्यास, और पांडवों की माता, रानी कुंतीदेवी ने भगवान कृष्ण के लिए प्रार्थना में उनके बारे में बताया है (खंड एक, अध्याय आठ)। परमहंस आम तौर पर अवैयक्तिकतावादियों और भक्तों दोनों के बीच पाए जाते हैं, लेकिन श्रीमद-भागवतम (जैसा कि कुंतीदेवी द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया है) के अनुसार, शुद्ध भक्ति-योग को परमहंसों द्वारा समझा जाता है, और कुंतीदेवी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भगवान अवतरित होते हैं (परित्राणाय साधुनम) विशेष रूप से परमहंसों को भक्ति-योग प्रदान करने के लिए। इसलिए अंततः परमहंस, इस शब्द के वास्तविक अर्थ में, भगवान के निष्कपट भक्त हैं। श्रील जीवा गोस्वामी ने सीधे स्वीकार किया है कि उच्चतम गंतव्य भक्ति-योग है, जिसके द्वारा कोई भगवान की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा को स्वीकार करता है। जो भक्ति-योग के मार्ग को स्वीकार करते हैं, वे तथ्यात्मक परमहंस हैं।

चूंकि भगवान सभी के प्रति बहुत दयालु हैं, अवैयक्तिकतावादी, जो भगवान के अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति में अस्तित्व में विलय होने के साधन के रूप में भक्ति को स्वीकार करते हैं, उन्हें भी उनके वांछित गंतव्य से सम्मानित किया जाता है। भगवद-गीता (4.11) में उन्होंने सभी को आश्वासन दिया है: ये यथा माम प्रपद्यन्ते। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, परमहंसों के दो वर्ग हैं, अर्थात् ब्रह्मानंद (अवैयक्तिकतावादी) और प्रेमानंद (भक्त), और दोनों को उनके वांछित गंतव्य प्रदान किए जाते हैं, हालांकि प्रेमानंद ब्रह्मानंद की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं। लेकिन ब्रह्मानंद और प्रेमानंद दोनों ही पारलौकिकतावादी हैं, और उनका जीवन की अस्तित्वगत पीड़ाओं से भरे हीन, भौतिक प्रकृति से कोई लेना-देना नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)