श्री शुक उवाच
नम: परस्मै पुरुषाय भूयसे
सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया ।
गृहीतशक्तित्रितयाय देहिना-
मन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने ॥ १२ ॥
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को प्रणाम करता हूं जो प्रकृति के तीनों गुणों को अपनाकर भौतिक जगत की सृष्टि करते हैं। वे हर शरीर में रहने वाले परम पूर्ण हैं और उनके तरीके अचिंतनीय हैं।
Sukadeva Goswami said: I offer my respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who accepts the three modes of nature for the creation of the material world. He is the Supreme Absolute, residing within every body, and His movements are inconceivable.
तात्पर्य
यह भौतिक संसार तीनों सात्विकताएँ, तमोगुण और अज्ञानता का प्रकटीकरण है, और सर्वोच्च भगवान, भौतिक संसार के निर्माण, रखरखाव और विनाश के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शंकर (शिव) के रूप में तीन प्रमुख रूपों को स्वीकार करते हैं। विष्णु के रूप में वह प्रत्येक भौतिक रूप से निर्मित शरीर में प्रवेश करते हैं। गर्भोदकशा स्थान विष्णु के रूप में वह प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश करता है, और क्षीरसागर शयन विष्णु के रूप में वह प्रत्येक जीव के शरीर में प्रवेश करता है। भगवान श्री कृष्ण, सभी विष्णु-तत्वों की उत्पत्ति होने के नाते, यहाँ पर पुरुषोत्तम या पुरुषोत्तम के रूप में संबोधित किया गया है, जैसा कि भगवद-गीता (15.18) में वर्णित है। वह संपूर्ण हैं। इसलिए पुरुषवतार उनके संपूर्ण विस्तार हैं। भक्ति-योग ही एकमात्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई भी उन्हें जानने के योग्य बन सकता है। क्योंकि अनुभववादी दार्शनिक और रहस्यवादी योगी ईश्वर व्यक्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते, इसलिए उन्हें अनुपारकष्य-वर्तने, अकल्पनीय पथ का भगवान या भक्ति-योग कहा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥