सूत गोस्वामी ने कहा: जब राजा ने शुकदेव गोस्वामी से इस प्रकार प्रार्थना की कि वे परमेश्वर की सृजनात्मक शक्ति का वर्णन करें, तो उन्होंने इन्द्रियों के स्वामी (श्रीकृष्ण) का ठीक से स्मरण किया और समुचित उत्तर देने के लिए इस प्रकार बोले।
Suta Goswami said: When the King prayed to Sukadeva Goswami to describe the creative power of the Lord, he properly remembered the Lord of the senses (Sri Krishna) and spoke thus to give an appropriate reply.
तात्पर्य
भगवान के भक्त जब प्रवचन देते हैं और भगवान के दिव्य गुणों का वर्णन करते हैं तो उन्हें यह नहीं लगता कि वे स्वयं कुछ भी कर सकते हैं। वे सोचते हैं कि वे केवल वही बोल सकते हैं जो परमेश्वर, इंद्रियों के स्वामी, उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। व्यक्तिगत प्राणी की इंद्रियाँ उसकी अपनी नहीं होती हैं; भक्त जानता है कि ऐसी इंद्रियाँ परमेश्वर की हैं और जब उनका उपयोग भगवान की सेवा के लिए किया जाता है तो उनका सही उपयोग किया जा सकता है। इंद्रियाँ यंत्र हैं और तत्व घटक हैं, सभी भगवान द्वारा संपन्न हैं; इसलिए एक व्यक्ति जो कुछ भी कर सकता है, बोल सकता है, देख सकता है, आदि, केवल भगवान के निर्देशन में ही है। भगवद-गीता (15.15) इसकी पुष्टि करती है: सर्वस्य चा Ham हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम् अपोहनं च। कोई भी स्वतंत्र रूप से और स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, और इसलिए व्यक्ति को हमेशा कार्य करने या खाने या बोलने के लिए भगवान की अनुमति लेनी चाहिए, और भगवान के आशीर्वाद से एक भक्त द्वारा किया गया कुछ भी वातानुकूलित आत्मा के विशिष्ट चार दोषों के सिद्धांतों से परे है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥