श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.4.10 
विचिकित्सितमेतन्मे ब्रवीतु भगवान् यथा ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णात: परस्मिंश्च भवान्खलु ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
कृपया इन सभी संशयों का समाधान करें, क्योंकि आप न केवल वैदिक साहित्य के ज्ञानी और आत्म-साक्षात्कारी हैं, बल्कि भगवान के महान भक्त भी हैं, इसलिए आप भगवान के समान हैं।
 
Please clear all these doubtful questions, because you are not only a great scholar of Vedic literature and self-realized in spirituality, but you are also a great devotee of the Lord and hence you are like the Lord himself.
तात्पर्य
ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि सर्वोच्च परम सत्य, गोविंद, ईश्वर का व्यक्तित्व, यद्यपि एक हैं और उनके समकक्ष कोई नहीं है, अनगिनत रूपों द्वारा अचूक रूप से विस्तारित होते हैं जो एक दूसरे से अलग नहीं हैं, और यद्यपि वह मूल व्यक्ति हैं, तब भी वे हमेशा युवा और स्थायी ऊर्जावान हैं। केवल वेदों के पारलौकिक विज्ञान को सीखने से उन्हें जानना बहुत कठिन है, लेकिन उनके शुद्ध भक्तों द्वारा उन्हें बहुत आसानी से जाना जा सकता है। भगवान के विभिन्न रूपों का विस्तार, जैसे कि कृष्ण से बलदेव से संकर्षण, संकर्षण से वसुदेव, वसुदेव से अनिरुद्ध, अनिरुद्ध से प्रद्युम्न, और फिर दूसरी बार संकर्षण के लिए, और उनसे नारायण पुरूषावतार और असंख्य अन्य रूप, जिनकी तुलना नदी की बेशुमार लहरों के निरंतर प्रवाह से की जाती है, सभी एक ही हैं। वे समान शक्ति के दीपकों की तरह हैं जो एक दीपक से दूसरे दीपक में प्रज्वलित होते हैं। यही भगवान की पारलौकिक शक्ति है। वेद कहते हैं कि वह इतने पूर्ण हैं कि यद्यपि उनकी पूरी पहचान उनसे निकलती है, फिर भी वे वही पूर्ण संपूर्ण रहते हैं (पूर्णस्य पूर्णम आदाया पूर्णम एवावशिष्यते)। जैसे, भगवान की भौतिक अवधारणा में कोई वैधता नहीं है जो मानसिक विचारक द्वारा निर्मित है। इस प्रकार, वह सांसारिक विद्वान के लिए हमेशा एक रहस्य बने रहते हैं, भले ही वह वैदिक साहित्यों में बहुत विद्वान हों (वेदेषु दुर्लभम अदुर्लभम आत्म-भक्तौ)। इसलिए, भगवान सांसारिक विद्वान, दार्शनिकों या वैज्ञानिकों की अवधारणा की सीमा से परे हैं। वह शुद्ध भक्त के लिए आसानी से समझने योग्य हैं क्योंकि भगवान भगवद-गीता (18.54) में घोषणा करते हैं कि ज्ञान के स्तर को पार करने के बाद, जब कोई भगवान की भक्ति सेवा में संलग्न होने में सक्षम होता है, तभी वह भगवान की वास्तविक प्रकृति को जान सकता है। कोई भी भगवान या उनके पवित्र नाम, रूप, गुणों, लीलाओं आदि के बारे में कोई स्पष्ट धारणा नहीं रख सकता, जब तक वह उनकी पारलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न न हो। भगवद-गीता का यह कथन कि पहले सभी अन्य व्यस्तताओं से मुक्त होकर, भगवान के प्रति समर्पण करना चाहिए, इसका मतलब है कि व्यक्ति को भगवान का शुद्ध, बिना शर्त भक्त बनना चाहिए। तभी वह भक्ति सेवा की ताकत से उसे जान सकता है। महाराजा परीक्षित ने पिछले श्लोक में स्वीकार किया था कि भगवान महानतम विद्वानों के लिए भी अकल्पनीय हैं। फिर उसे फिर से भगवान के बारे में अपने अपर्याप्त ज्ञान को स्पष्ट करने के लिए शुकदेव गोस्वामी से अनुरोध क्यों करना चाहिए? इसका कारण स्पष्ट है। न केवल शुकदेव गोस्वामी वैदिक साहित्यों में अत्यधिक विद्वान थे, बल्कि वह एक महान आत्म-साक्षात्कार प्राप्त आत्मा और भगवान के एक शक्तिशाली भक्त भी थे। भगवान का एक शक्तिशाली भक्त, भगवान की कृपा से, स्वयं भगवान से अधिक है। भगवान का व्यक्तित्व श्री रामचंद्र ने लंका के द्वीप तक पहुंचने के लिए हिंद महासागर पर पुल बनाने का प्रयास किया, लेकिन भगवान के व्यक्तित्व के निडर भक्त श्री हनुमानजी, सीधे उस पर कूदकर समुद्र पार कर सकते थे। भगवान अपने शुद्ध भक्त पर इतने दयालु हैं कि वह अपने प्यारे भक्त को खुद से अधिक शक्तिशाली के रूप में प्रस्तुत करते हैं। भगवान ने खुद को दुर्वासा मुनि को बचाने में असमर्थ बताया, यद्यपि मुनि इतने शक्तिशाली थे कि वे भौतिक परिस्थितियों में सीधे भगवान तक पहुँच सकते थे। लेकिन दुर्वासा मुनि को भगवान के भक्त महाराजा अंबरीष ने बचाया था। इसलिए, न केवल भगवान का भक्त भगवान से अधिक शक्तिशाली होता है, बल्कि भक्त की पूजा को भगवान की सीधी पूजा से अधिक प्रभावी माना जाता है (मद-भक्त-पूजाभ्यधिक)।

इसलिए निष्कर्ष यह है कि एक गंभीर भक्त को पहले एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाना चाहिए जो न केवल वैदिक साहित्य में निपुण है बल्कि तथ्यात्मक रूप से भगवान और उनकी विभिन्न ऊर्जाओं का साक्षात्कार करने वाले एक महान भक्त भी हैं। ऐसे भक्त आध्यात्मिक गुरु की सहायता के बिना, कोई भी भगवान के पारलौकिक विज्ञान में प्रगति नहीं कर सकता। और एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु, जैसे कि शुकदेव गोस्वामी, भगवान के बारे में केवल उनकी आंतरिक शक्तियों के बारे में ही नहीं बोलते, बल्कि यह भी बताते हैं कि वह अपनी बाहरी शक्तियों के साथ कैसे जुड़ते हैं। आंतरिक शक्ति में भगवान के मनोरंजन को वृंदावन में उनकी गतिविधियों में प्रदर्शित किया जाता है, लेकिन उनकी बाहरी शक्ति की कार्यप्रणाली कर्णार्णवशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु के उनके रूपों में निर्देशित होती है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती साहित्य इच्छुक वैष्णवों को अपनी अच्छी सलाह देते हैं जब वे कहते हैं कि उन्हें केवल भगवान की गतिविधियों (जैसे रास-लीला) के बारे में सुनने में रुचि नहीं होनी चाहिए, बल्कि सृष्टि-तत्व, सृजनात्मक कार्यों के संबंध में पुरुषावतारों के उनके मनोरंजनों में गहरी रुचि लेनी चाहिए, महाराज परीक्षित के उदाहरणों का अनुसरण करते हुए, आदर्श शिष्य और शुकदेव गोस्वामी, आदर्श आध्यात्मिक गुरु।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)