श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.4.1 
सूत उवाच
वैयासकेरिति वचस्तत्त्वनिश्चयमात्मन: ।
उपधार्य मतिं कृष्णे औत्तरेय: सतीं व्यधात् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
सूत गोस्वामी ने कहा: आत्मा की सच्चाई के बारे में शुकदेव गोस्वामी की बातें सुनने के बाद, महाराजा परीक्षित, जो उत्तरा के पुत्र थे, ने आस्थापूर्वक अपना ध्यान भगवान कृष्ण पर केंद्रित कर दिया।
 
Suta Goswami said: Having heard Sukadeva Goswami talk about the truth of the soul, Maharaja Pariksit, the son of Uttara, faithfully fixed his attention upon Lord Krishna.
तात्पर्य
शब्द सतीम बेहद महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है "जीवंत" और "पवित्र।" और दोनों तत्व महाराजा परीक्षित के मामले में पूरी तरह से लागू होते हैं। पूरे वैदिक साहसिक कार्य का उद्देश्य व्यक्ति का ध्यान किसी भी तरह के विचलन के बिना पूरी तरह से भगवान कृष्ण के चरण कमलों की ओर आकर्षित करना होता है, जैसा कि भगवत-गीता (15.15) में निर्देश दिया गया है। सौभाग्य से महाराजा परीक्षित पहले से ही भगवान के प्रति आकर्षित थे, अपने शरीर की शुरुआत से ही, अपनी माँ के गर्भ में। अपनी माँ के गर्भ में उन्हें अश्वथामा द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र परमाणु बम से प्रहार किया गया था, लेकिन भगवान की कृपा से उन्हें उस अग्निमय हथियार से जलने से बचा लिया गया था, और तब से राजा ने लगातार अपने मन को भगवान कृष्ण पर केन्द्रित करना शुरू किया, जिससे वह भक्ति सेवा में पूरी तरह से पवित्र हो गए। सहज क्रम में, वह भगवान के पवित्र भक्त थे और जब उन्होंने श्रीला शुकदेव गोस्वामी से आगे सुना कि व्यक्ति को केवल भगवान की पूजा करनी चाहिए और किसी और की नहीं, भले ही वे सभी इच्छाओं या इच्छाहीन से भरे हों, तो कृष्ण के प्रति उनका स्वाभाविक स्नेह और मजबूत हो गया। हम पहले ही इन विषयों पर चर्चा कर चुके हैं। भगवान कृष्ण के शुद्ध भक्त बनने के लिए, दो चीजें बहुत आवश्यक हैं, अर्थात्, एक भक्त के परिवार में जन्म लेने का मौका और एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु का आशीर्वाद। भगवान कृष्ण की कृपा से, परीक्षित महाराज के पास दोनों अवसर थे। उनका जन्म पाण्डवों जैसे भक्तों के परिवार में हुआ था और पाण्डवों के वंश को जारी रखने और उन पर विशेष कृपा दिखाने के लिए, भगवान ने विशेष रूप से महाराजा परीक्षित को बचाया, जो बाद में भगवान की व्यवस्था से, एक ब्राह्मण के बालक द्वारा शापित हो गए और उन्हें शुकदेव गोस्वामी जैसे आध्यात्मिक गुरु का साथ मिला। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि एक भाग्यशाली व्यक्ति, आध्यात्मिक गुरु और भगवान कृष्ण की दया से, भक्ति सेवा का मार्ग प्राप्त करता है। यह महाराजा परीक्षित के मामले में पूरी तरह से लागू होता था। भक्त परिवार में जन्म लेने के माध्यम से, वह स्वतः ही कृष्ण के संपर्क में आ गए, और उनसे संपर्क करने के बाद वे उन्हें निरंतर याद करते रहे। फलस्वरूप भगवान कृष्ण ने राजा को भक्ति सेवा में विकास का एक और मौका दिया, जिससे उनका परिचय शुकदेव गोस्वामी से कराया, जो आत्म-साक्षात्कार में पूर्ण ज्ञान के साथ भगवान के एक कट्टर भक्त थे। और एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से सुनकर, वे अपने पवित्र मन को भगवान कृष्ण पर और भी अधिक केंद्रित करने में सक्षम थे, यह एक स्वाभाविक बात थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)