श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.3.25 
अथाभिधेह्यङ्ग मनोऽनुकूलं
प्रभाषसे भागवतप्रधान: ।
यदाह वैयासकिरात्मविद्या-
विशारदो नृपतिं साधु पृष्ट: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
हे सूतगोस्वामी, आपके वचन हमारे मन को अच्छे लग रहे हैं। कृपया हमें ये बताएँ जैसा कि ये दिव्य ज्ञान में अति दक्ष महान भक्त शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित के पूछने पर उन्हें बताया था।
 
O Suta Goswami, your words are pleasing to our minds. Therefore, kindly tell us this in the same manner in which the supreme devotee Sukadeva Goswami, who is highly skilled in transcendental knowledge, told Maharaja Pariksit when he asked for it.
तात्पर्य
शुकादेव गोस्वामी जैसे पूर्व आचार्य द्वारा समझाया गया और सूत गोस्वामी जैसे अगले आचार्य द्वारा अनुसरण किया गया ज्ञान हमेशा शक्तिशाली पारलौकिक ज्ञान होता है, और इसलिए यह सभी विनम्र छात्रों के लिए व्यापक और उपयोगी है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दो के अंतर्गत तीसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)