श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.3.24 
तदश्मसारं हृदयं बतेदं
यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयै: ।
न विक्रियेताथ यदा विकारो
नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्ष: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही वह हृदय पत्थर के समान है, जो एकाग्र होकर प्रभु के पवित्र नाम का जाप करने पर भी नहीं बदलता; जब हर्ष होता है, तो आँखों में आँसू नहीं छलकते और शरीर के रोम-रोम पुलकित नहीं होते।
 
Surely that heart is made of steel which does not change even when one chants the holy name of the Lord with concentration; when one feels joy, the eyes do not fill with tears and every hair on the body does not stand on end.
तात्पर्य
हमें लाभ के साथ ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे कांटो के पहले तीन अध्यायों में भक्ति भावना के विकास की एक धीमी प्रक्रिया प्रस्तुत की गई है। पहले अध्याय में श्रवण और जप की प्रक्रिया द्वारा ईश्वर भक्ति का पहला चरण बताया गया है और नौसिखियों के लिए अपने सार्वभौमिक रूप में भगवान के व्यक्तित्व की एक स्थूल अवधारणा की सिफारिश की गई है। अपनी ऊर्जा के भौतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से ईश्वर की ऐसी एक स्थूल अवधारणा से, व्यक्ति अपने मन और इन्द्रियों को आध्यात्मिक बनाने और धीरे-धीरे अपने मन को भगवान विष्णु, सर्वोच्च, जो हर दिल में और हर जगह, भौतिक ब्रह्मांड के प्रत्येक परमाणु में परम आत्मा के रूप में विद्यमान है, पर केन्द्रित करने में सक्षम होता है। आम आदमी के लिए पांच मानसिक दृष्टिकोण की सिफारिश करने वाली पंच-उपासना की प्रणाली, भी इस उद्देश्य के लिए अधिनियमित है, अर्थात् क्रमिक विकास, श्रेष्ठ की पूजा जो आग, बिजली, सूर्य, जीवित प्राणियों का समूह, भगवान शिव और अंत में, निजी परमात्मा, भगवान विष्णु का आंशिक प्रतिनिधित्व के रूप में हो सकती है। उन सभी को दूसरे अध्याय में अच्छी तरह से वर्णित किया गया है, लेकिन तीसरे अध्याय में आगे के विकास को तब निर्धारित किया गया है जब कोई वास्तव में विष्णु पूजा या विशुद्ध भक्ति सेवा के चरण में पहुँच जाता है, और विष्णु पूजा के परिपक्व चरण को यहाँ हृदय परिवर्तन के संबंध में सुझाया गया है।

आध्यात्मिक संस्कृति की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य परमेश्वर के साथ अपने शाश्वत संबंध के मामले में जीवित प्राणी के हृदय को बदलना है जो अधीनस्थ सेवक के रूप में है, जो उसकी शाश्वत संवैधानिक स्थिति है। इसलिए भक्ति सेवा की प्रगति के साथ, हृदय में परिवर्तन की प्रतिक्रिया, दुनिया पर प्रभुता की झूठी भावना से भौतिक भोग की भावना से क्रमिक टुकड़ी और प्रभु को प्रेममय सेवा प्रदान करने के दृष्टिकोण में वृद्धि द्वारा प्रदर्शित की जाती है। विधि-भक्ति, या शरीर के अंगों द्वारा विनियमित भक्ति सेवा (अर्थात आँखें, कान, नाक, हाथ और पैर, जैसा कि पहले ही यहाँ समझाया गया है), अब यहाँ मन के संबंध में बल दिया गया है, जो शरीर के अंगों की सभी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन है। यह हर तरह से अपेक्षित है कि विनियमित भक्ति सेवा का निर्वहन करने से व्यक्ति को हृदय परिवर्तन प्रकट करना चाहिए। यदि ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है, तो हृदय को इस्पात-निर्मित माना जाना चाहिए, क्योंकि प्रभु के पवित्र नाम का जप करने पर भी यह पिघलता नहीं है। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि श्रवण और जप भक्ति कर्तव्यों का निर्वहन करने के मूल सिद्धांत हैं, और यदि उन्हें ठीक से किया जाता है तो आँखों में आँसुओं और शरीर पर बालों के खड़े होने के लक्षणों के साथ प्रतिक्रियावादी उन्माद का पालन होगा। ये प्राकृतिक परिणाम हैं और भाव अवस्था के प्रारंभिक लक्षण हैं, जो ईश्वर के प्रेम प्रेम की पूर्णता अवस्था तक पहुँचने से पहले होता है।

यदि भगवान के पवित्र नाम के लगातार श्रवण और जप के बाद भी प्रतिक्रिया नहीं होती है, तो इसे केवल अपराधों के कारण माना जा सकता है। संदर्भ का यही मत है। भगवान के पवित्र नाम का जप करने की शुरुआत में, यदि भक्त पवित्र नाम के चरणों में दस प्रकार के अपराधों से बचने के बारे में बहुत सावधान नहीं रहा है, तो निश्चित रूप से आँखों में आँसुओं और अंत में बालों के खड़े होने से अलगाव की भावनाओं की प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देगी।

भाव अवस्था आठ पारलौकिक लक्षणों, जैसे जड़ता, पसीना, बाल खड़े होना, आवाज में विफल होना, काँपना, शरीर का पीलापन, आँखों में आँसू और अंत में ट्रान्स. द नेक्टर ऑफ़ डिवोशन, श्रील रूप गोस्वामी के भक्ति-रसामृत-सिंधु का सारांश अध्ययन, उन लक्षणों की व्याख्या करता है और स्थिर और त्वरित अभिव्यक्तियों में अन्य पारलौकिक विकासों का विशद वर्णन करता है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इन सभी भाव प्रदर्शनों पर, कुछ बेईमान नवोदित साधकों द्वारा सस्ती प्रशंसा के लिये उपरोक्त लक्षणों की नकल किये जाने के संबंध में, बहुत आलोचनात्मक रूप से चर्चा की है। न केवल विश्वनाथ चक्रवर्ती बल्कि श्रील रूप गोस्वामी ने भी उनकी बहुत आलोचना की। कभी-कभी सभी ऊपर बताये आठ प्रकार के आनंद के लक्षणों की नकल सांसारिक भक्तों (प्राकृत-सहजियाओं) द्वारा की जाती है, लेकिन जब पाखंडी भक्त को बहुत सी निषिद्ध चीजों के आदी देखा जाता है तो छद्म लक्षणों का तुरंत पता लग जाता है। यद्यपि भक्त के चिह्नों से सजे होने पर भी, धूम्रपान, मदिरापान या महिलाओं के साथ अवैध यौन संबंध के आदी व्यक्ति में उपर्युक्त सभी प्रकार के आनंद के लक्षण नहीं हो सकते। लेकिन यह देखा जाता है कि कभी-कभी इन लक्षणों की जानबूझकर नकल की जाती है, और इस कारण से श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती नकल करने वालों पर पत्थरदिल होने का आरोप लगाते हैं। वे कभी-कभी ऐसे अलौकिक लक्षणों के प्रतिबिंब से भी प्रभावित होते हैं, फिर भी यदि वे अभी भी निषिद्ध आदतों को नहीं छोड़ते हैं, तो वे अलौकिक साक्षात्कार के लिए निराशाजनक मामले हैं।

जब भगवान चैतन्य गोदावरी के तट पर कवौर के श्रील रामानंद राय से मिले, तो भगवान ने इन सभी लक्षणों को विकसित किया, लेकिन कुछ गैर-भक्त ब्राह्मणों की उपस्थिति के कारण जो राय के परिचारक थे, भगवान ने इन लक्षणों को दबा दिया। इसलिए कभी-कभी वे किसी प्रथम श्रेणी के भक्त के शरीर में भी कुछ परिस्थितिजन्य कारणों से दिखाई नहीं देते हैं। इसलिए वास्तविक, स्थिर भाव निश्चित रूप से भौतिक इच्छाओं की समाप्ति (क्षांति), भगवान की अलौकिक प्रेममयी सेवा में हर पल का उपयोग करने (अव्यर्थ-कालत्व), लगातार भगवान की महिमा का गुणगान करने की उत्सुकता (नाम-गान में सदा रुचि), भगवान की भूमि में रहने के लिए आकर्षण (प्रतिस तद-वसति स्थले), भौतिक सुख से पूर्ण अनासक्ति (विरक्ति) और घमंड की अनुपस्थिति (मान-शून्यता) के मामले में प्रदर्शित होता है। जिसने इन सभी पारलौकिक गुणों को विकसित कर लिया है, वह वास्तव में भाव अवस्था से संपन्न है, जो पत्थरदिल नकल करने वाले या सांसारिक भक्त से अलग है।

पूरी प्रक्रिया को निम्न प्रकार से संक्षेपित किया जा सकता है: उन्नत भक्त जो भगवान के पवित्र नाम का पूर्ण रूप से निर्दोष ढंग से जप करता है और सभी के लिए अनुकूल है, वह वास्तव में भगवान के गौरव-गान के पारलौकिक स्वाद का आनंद ले सकता है। और इस तरह की साक्षात्कार का परिणाम भौतिक इच्छाओं की समाप्ति आदि में परिलक्षित होता है, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है। नवोदित साधक, भक्ति सेवा की निम्नतर स्थिति में होने के कारण, हमेशा ईर्ष्यालु होते हैं, इतना ही नहीं कि वे आचार्यों का अनुसरण किए बिना अपनी खुद की भक्ति संबंधी विधियों और साधनों का आविष्कार करते हैं। जैसे, भले ही वे भगवान के पवित्र नाम का लगातार जप करने का दिखावा करते हों, वे पवित्र नाम के पारलौकिक स्वाद का आनंद नहीं ले सकते। इसलिए, आँखों में आंसू आना, काँपना, पसीना आना, बेहोशी आदि को निंदा की जाती है। हालाँकि, वे भगवान के शुद्ध भक्त से संपर्क कर सकते हैं और अपनी बुरी आदतों को सुधार सकते हैं; अन्यथा वे पत्थरदिल बने रहेंगे और किसी भी इलाज के लिए अयोग्य होंगे। भगवद-धाम वापस, अपने घर लौटने के पथ पर एक पूर्ण प्रगतिशील प्रस्थान एक प्राप्त भक्त द्वारा निर्देशित प्रकट शास्त्रों के उपदेशों पर निर्भर करेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)