श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.3.20 
बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये
न श‍ृण्वत: कर्णपुटे नरस्य ।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथा: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
जिसने भगवान् के शौर्य और अद्भुत कार्यों की कथाएँ नहीं सुनीं, और जिसने उनके बारे में गीत नहीं गाए या ऊँची आवाज में उच्चारण नहीं किया है, उसके कान तो सांप के बिल ही हैं, और जीभ मेंढक जीभ के समान है।
 
One who has not heard the stories of the Lord's heroic and wonderful deeds, and who has not sung or loudly recited songs about the Lord, his ear holes are like the holes of a serpent and his tongue is like the tongue of a frog.
तात्पर्य
भगवान की भक्ति सेवा शरीर के सभी अंगों और भागों द्वारा की जाती है। यह आत्मा की आध्यात्मिक गतिशील शक्ति है। इसलिए भक्त भगवान की सेवा में शतप्रतिशत लीन रहता है। सेवा में तब ही जुटे रह सकते हैं जब शरीर की इंद्रियों को भगवान के संबंध में शुद्ध किया जाए और भगवान की सेवा सभी इंद्रियों की सहायता से की जा सके। जैसे ही इंद्रियाँ और उनकी क्रियाओं को, जब तक वे केवल इंद्रिय तृप्ति में प्रयुक्त होती रहती हैं, अपवित्र या भौतिकवादी माना जाता है। शुद्ध इंद्रियों का उपयोग इंद्रिय तृप्ति में नहीं, बल्कि भगवान की सेवा में ही होता है। भगवान सर्वोच्च हैं जिनके पास सभी इन्द्रियाँ हैं, और उनका सेवक, जो उनका अभिन्न अंग है, उसके भी समान इंद्रियाँ होती हैं। भगवान की सेवा इंद्रियों का पूर्णतः शुद्ध उपयोग है, जैसा कि भगवद-गीता में वर्णित है। भगवान ने पूर्ण इन्द्रियों से निर्देश दिए, और अर्जुन ने उन्हें पूर्ण इन्द्रियों के साथ प्राप्त किया, और इस प्रकार गुरु और शिष्य के बीच संवेदनात्मक और तार्किक समझ का एक आदर्श आदान-प्रदान हुआ। आध्यात्मिक समझ गुरु से शिष्य तक विद्युत प्रभार की तरह कुछ नहीं है, जैसा कि कुछ प्रचारकों द्वारा मूर्खतापूर्ण दावा किया जाता है। सब कुछ भाव और तर्क से भरा है, और गुरु और शिष्य के बीच विचारों का आदान-प्रदान तभी संभव है जब ग्रहणशीलता विनम्र और वास्तविक हो। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि भगवान चैतन्य की शिक्षा को बुद्धि और पूर्ण इंद्रियों के साथ प्राप्त करना चाहिए ताकि कोई इस महान मिशन को तार्किक रूप से समझ सके।

साधारण जीव की अशुद्ध अवस्था में, उसकी विभिन्न इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से सांसारिक मामलों में लगी रहती हैं। यदि भगद्गीता या श्रीमद्भगवतम से उनके बारे में सुनने में कान भगवान की सेवा में नहीं लगे हैं, तो निश्चित रूप से कान के छेद किसी कूड़े से भरे होंगे। इसलिए भगवद्गीता और श्रीमद्भगवतम् के संदेशों को पूरे विश्व में बहुत ऊँचे स्वर से प्रचारित किया जाना चाहिए। यह एक शुद्ध भक्त का कर्तव्य है जो वास्तव में उन्हें सही स्रोतों से सुन चुका है। बहुत से लोग दूसरों से कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन क्योंकि उन्हें वैदिक ज्ञान के विषय पर बोलने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता है, वे सभी बकवास बोल रहे हैं, और लोग इसे बिना किसी समझ के स्वीकार कर रहे हैं। दुनिया के सांसारिक समाचारों को वितरित करने के लिए सैकड़ों और हजारों स्रोत हैं, और दुनिया के लोग भी उन्हें प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार, दुनिया के लोगों को भगवान के आध्यात्मिक विषयों को सुनने के लिए सिखाया जाना चाहिए, और भगवान के भक्त को इतनी ऊँची आवाज़ से बोलना चाहिए कि वे सुन सकें। मेंढक जोर-जोर से टर्राते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे सांपों को उन्हें खाने के लिए आमंत्रित करते हैं। मानवीय जीभ को विशेष रूप से वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने के लिए दिया गया है न कि मेंढकों की तरह टर्राने के लिए। इस श्लोक में प्रयुक्त असती शब्द भी महत्वपूर्ण है। असती का अर्थ है वह स्त्री जो वेश्या बन गई है। एक वेश्या की अच्छी स्त्रैण गुणों के लिए कोई प्रतिष्ठा नहीं होती। उसी प्रकार, वह जीभ, जो मनुष्य को वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने के लिए दी जाती है, को भौतिक बकवास का उच्चारण करने में लगाने पर वेश्या माना जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)