श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.3.19 
श्वविड्‍वराहोष्ट्रखरै: संस्तुत: पुरुष: पशु: ।
न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रज: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग कुत्तों, सूअरों, ऊंटों और गधों जैसे होते हैं, वे उन्हीं लोगों की प्रशंसा करते हैं जो कभी भी भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं को नहीं सुनते हैं, जो सभी बुराइयों से मुक्ति दिलाती हैं।
 
Men like dogs, hogs, camels and donkeys praise those who never hear the transcendental pastimes of Lord Sri Krishna, the liberator from all evils.
तात्पर्य
लोगों का सामान्य जनसमूह, जब तक कि उन्हें आध्यात्मिक मूल्यों में जीवन के उच्च मानक के लिए व्यवस्थित रूप से प्रशिक्षित नहीं किया जाता है, जानवरों से बेहतर नहीं हैं, और इस छंद में उन्हें विशेष रूप से कुत्तों, सूअरों, ऊँटों और गधों के स्तर पर रखा गया है। आधुनिक विश्वविद्यालय शिक्षा व्यावहारिक रूप से किसी को एक कुत्ते जैसी मानसिकता प्राप्त करने के लिए तैयार करती है, जिसके साथ एक बड़े गुरु की सेवा स्वीकार की जाती है। तथाकथित शिक्षा पूरी करने के बाद, तथाकथित शिक्षित व्यक्ति कुछ सेवा के लिए आवेदनों के साथ कुत्तों की तरह दरवाजे-दरवाजे जाते हैं, और ज्यादातर उन्हें हटा दिया जाता है, किसी रिक्ति की जानकारी नहीं दी जाती। जैसा कि कुत्ते लापरवाह जानवर हैं और थोड़े से रोटी के टुकड़ों के लिए वफादारी से स्वामी की सेवा करते हैं, एक व्यक्ति पर्याप्त पुरस्कार के बिना वफादारी से स्वामी की सेवा करता है।

जिन लोगों को भोजन के मामले में कोई भेदभाव नहीं है और जो सभी प्रकार का कचरा खाते हैं, उनकी तुलना सूअरों से की जाती है। सूअर मल खाने से बहुत अधिक जुड़े होते हैं। तो मल एक विशेष प्रकार के जानवर के लिए एक प्रकार का भोजन है। और पत्थर भी एक विशेष प्रकार के जानवर या पक्षी के लिए खाने योग्य होते हैं। लेकिन मनुष्य हर चीज को खाने के लिए नहीं है; वह अनाज, सब्जियां, फल, दूध, चीनी आदि खाने के लिए है। पशु भोजन मनुष्य के लिए नहीं है। ठोस भोजन चबाने के लिए, मनुष्य के पास एक विशेष प्रकार के दांत होते हैं जो फल और सब्जियों को काटने के लिए होते हैं। मनुष्य को दो कुत्ते के दाँत दिए गए हैं जो उन लोगों के लिए रियायत के तौर पर है जो किसी भी कीमत पर पशु भोजन खाएँगे। यह तो सब जानते हैं कि एक आदमी का खाना दूसरे आदमी के लिए जहर है। मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह भगवान श्री कृष्ण को अर्पित भोजन के अवशेष को स्वीकार करे, और भगवान पत्ते, फूल, फल आदि श्रेणियों से भोजन स्वीकार करते हैं। (भगवद् गीता 9.26)। जैसा कि वैदिक शास्त्रों में निर्धारित है, प्रभु को कोई पशु भोजन नहीं चढ़ाया जाता है। इसलिए, एक मनुष्य को एक विशेष प्रकार का भोजन करना चाहिए। उसे तथाकथित विटामिन मूल्य प्राप्त करने के लिए जानवरों की नकल नहीं करनी चाहिए। इसलिए, एक व्यक्ति जिसे खाने के संबंध में कोई भेदभाव नहीं है, उसकी तुलना एक सूअर से की जाती है।

ऊँट एक प्रकार का जानवर है जिसे कांटे खाने में आनंद आता है। एक व्यक्ति जो पारिवारिक जीवन या सांसारिक जीवन का आनंद लेना चाहता है, उसकी तुलना ऊँट से की जाती है। भौतिकवादी जीवन कांटों से भरा है, और इसलिए व्यक्ति को केवल वैदिक नियमों की निर्धारित विधि द्वारा ही सबसे अच्छा उपयोग करने के लिए जीना चाहिए। भौतिक दुनिया में जीवन अपना ही खून चूसने से बना रहता है। भौतिक आनंद के लिए आकर्षण का केंद्रीय बिंदु यौन जीवन है। यौन जीवन का आनंद लेने के लिए अपना खून चूसना है, और इस संबंध में और अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। कंटीली टहनियों को चबाते समय ऊंट भी अपना खून चूसता है। ऊंट जो कांटे खाता है वह ऊंट की जीभ को काटते हैं, और इसलिए ऊंट के मुंह के भीतर खून बहने लगता है। ताजे रक्त के साथ मिश्रित कांटे, मूर्ख ऊँट के लिए एक स्वाद पैदा करते हैं, और इसलिए वह झूठे आनंद के साथ कांटे खाने का व्यवसाय करता है। इसी प्रकार, महान व्यापारिक दिग्गज, उद्योगपति जो विभिन्न तरीकों और संदिग्ध तरीकों से पैसा कमाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, अपने खून से मिश्रित अपने कार्यों के कांटेदार परिणाम खाते हैं। इसलिए भागवतम ने इन रोगग्रस्त साथियों को ऊँटों के साथ रखा है।

गधा एक ऐसा जानवर है जिसे जानवरों के बीच भी सबसे बड़ा मूर्ख माना जाता है। गधा बहुत मेहनत करता है और अधिकतम वजन के बोझ उठाता है पर अपने लिए कुछ नहीं कमाता है। गधा आमतौर पर धोबी के द्वारा लगवाया जाता है जिसकी सामाजिक स्थिति बहुत प्रतिष्ठित नहीं होती। गधे की एक विशेष योग्यता यह होती है कि उसे विपरीत लिंग द्वारा लात मारने की बहुत आदत होती है। जब गधा संभोग के लिए विनती करता है, उसे सुंदर लिंग द्वारा लात मारी जाती है, फिर भी वह ऐसी यौन सुख के लिए मादा का पीछा करता रहता है। इसलिए धोबी को गधे से तुलना की जाती है। लोगों का सामान्य समूह बहुत मेहनत करता है, विशेष रूप से कलियुग में। इस युग में इंसान वास्तव में एक गधे के काम में लग जाता है, भारी बोझ उठाता है और ठेला और रिक्शा चलाता है। मानव सभ्यता की तथाकथित उन्नति ने इंसान को गधे के काम में लगा दिया है। बड़ी फैक्ट्रियों और वर्कशॉप में श्रमिक भी ऐसे ही बोझिल काम में लग जाते हैं, और दिन भर मेहनत करने के बाद, गरीब श्रमिक को फिर सुंदर लिंग द्वारा सिर्फ यौन सुख के लिए नहीं बल्कि बहुत से घरेलू मामलों के लिए भी लात मारी जानी पड़ती है। इसलिए बिना किसी आध्यात्मिक ज्ञान के साधारण व्यक्ति की श्रीमद्-भागवतम की श्रेणीकार्रवाई कुत्तों, सूअरों, ऊँटों और गधों में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। ऐसे अज्ञानी लोगों के नेता कुत्तों और सूअरों की इतनी बड़ी संख्या द्वारा सम्मानित होने पर बहुत गर्व महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह बहुत कुछ चापलूसी जैसा है। भागवतम खुले तौर पर घोषणा करता है कि यद्यपि एक व्यक्ति पुरुषों के रूप में प्रच्छन्न ऐसे कुत्तों और सूअरों का एक बड़ा नेता हो सकता है, अगर उसे कृष्ण के विज्ञान में प्रबुद्ध होने का कोई स्वाद नहीं है, तो ऐसा नेता भी एक जानवर है और कुछ नहीं। उसे एक शक्तिशाली, मजबूत जानवर, या एक बड़ा जानवर नामित किया जा सकता है, लेकिन श्रीमद्-भागवतम के अनुमान में उसे कभी भी इंसान की श्रेणी में जगह नहीं दी जाती है, उसके नास्तिक स्वभाव के कारण। या दूसरे शब्दों में, कुत्तों और सूअर जैसे पुरुषों के ऐसे निरीश्वर नेता बड़े जानवर होते हैं जिनमें जानवरों के गुण अधिक अनुपात में होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)