श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.3.18 
तरव: किं न जीवन्ति भस्त्रा: किं न श्वसन्त्युत ।
न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामे पशवोऽपरे ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
क्या वृक्षों में जीवन नहीं है? क्या लोहार की धौंकनी में साँस नहीं चलती? हमारे आसपास क्या जानवर भोजन नहीं करते हैं? या वीर्य का त्याग नहीं करते हैं?
 
Do trees not live? Doesn't the blacksmith's bellows breathe? Do the animals around us not eat? Or ejaculate?
तात्पर्य
आधुनिक युग का भौतिकवादी व्यक्ति तर्क देगा कि जीवन या उसका कुछ हिस्सा, कभी भी धर्मशास्त्रीय या धार्मिक तर्कों पर चर्चा के लिए नहीं है। जीवन खाने, पीने, यौन संभोग, मौज-मस्ती करने और जीवन का आनंद लेने के लिए अधिकतम अवधि के लिए है। आधुनिक मनुष्य भौतिक विज्ञान की उन्नति से हमेशा जीना चाहता है, और जीवन को अधिकतम अवधि तक बढ़ाने के लिए कई मूर्खतापूर्ण सिद्धांत हैं। लेकिन श्रीमद्-भागवतम इस बात की पुष्टि करता है कि जीवन खाने, पीने, मौज-मस्ती करने के लिए तथाकथित आर्थिक विकास या भौतिक विज्ञान की उन्नति के लिए नहीं है। जीवन केवल तपस्या के लिए है, अस्तित्व को शुद्ध करने के लिए ताकि मनुष्य की मृत्यु के बाद ही मनुष्य जीवन के अंत के बाद अनंत जीवन में प्रवेश कर सके। भौतिकवादी लोग जितना संभव हो उतना अधिक जीवन जीना चाहते हैं क्योंकि उन्हें अगले जीवन की कोई जानकारी नहीं है। वे इस वर्तमान जीवन में अधिकतम आराम पाना चाहते हैं क्योंकि वे निर्णायक रूप से सोचते हैं कि मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं है। जीवित प्राणी की अनंतता और भौतिक दुनिया में आवरण के परिवर्तन के बारे में यह अज्ञानता ने आधुनिक मानव समाज की संरचना में कहर बरपाया है। परिणामस्वरूप कई समस्याएं हैं, आधुनिक मनुष्य की विभिन्न योजनाओं से गुणा। समाज की समस्याओं को हल करने की योजनाओं ने केवल परेशानियों को बढ़ा दिया है। भले ही जीवन को सौ साल से अधिक बढ़ाना संभव हो, लेकिन मानव सभ्यता की उन्नति आवश्यक रूप से अनुसरण नहीं करती है। भागवत कहता है कि कुछ पेड़ सैकड़ों और हजारों वर्षों तक जीवित रहते हैं। वृंदावन में एक इमली का पेड़ है (जगह को इमलीतला के नाम से जाना जाता है) जिसे भगवान कृष्ण के समय से अस्तित्व में कहा जाता है। कलकत्ता बॉटनिकल गार्डन में एक बरगद का पेड़ है जिसे पांच सौ साल से भी पुराना बताया जाता है, और पूरी दुनिया में ऐसे कई पेड़ हैं। स्वामी शंकराचार्य केवल बत्तीस वर्ष जीवित रहे, और भगवान चैतन्य अट्ठाईस वर्ष जीवित रहे। क्या इसका मतलब यह है कि उपर्युक्त पेड़ों का लंबा जीवन शंकर या चैतन्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है? आध्यात्मिक मूल्य के बिना लंबे समय तक जीवन बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। कोई संदेह कर सकता है कि पेड़ों में जीवन है क्योंकि वे सांस नहीं लेते हैं। लेकिन बोस जैसे आधुनिक वैज्ञानिक पहले ही साबित कर चुके हैं कि पौधों में जीवन है, इसलिए सांस लेना वास्तविक जीवन का कोई संकेत नहीं है। भागवत कहता है कि लोहार की धौंकनी बहुत अच्छी तरह से सांस लेती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि धौंकनी में जीवन है। भौतिकवादी तर्क देंगे कि पेड़ में जीवन और मनुष्य में जीवन की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि पेड़ स्वादिष्ट व्यंजन खाने या यौन सम्बन्ध का आनंद उठाकर जीवन का आनंद नहीं उठा सकता। इसके जवाब में भागवत पूछता है कि क्या कुत्ते और सूअर जैसे अन्य जानवर इंसानों के साथ एक ही गांव में रहकर खाते-पीते और यौन जीवन का आनंद नहीं लेते हैं। "अन्य जानवरों" के संबंध में श्रीमद्-भागवत के विशिष्ट उच्चारण का अर्थ है कि जो व्यक्ति केवल खाने, पीने और प्रजनन से युक्त एक बेहतर प्रकार के पशु जीवन की योजना बनाने में लगे हुए हैं, वे भी मानव रूप में जानवर हैं। ऐसे परिष्कृत जानवरों का समाज पीड़ित मानवता को लाभ नहीं पहुंचा सकता, क्योंकि एक जानवर आसानी से दूसरे जानवर को नुकसान पहुंचा सकता है लेकिन शायद ही कभी अच्छा करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)