आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।
तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥
अनुवाद
उदय और अस्त होते हुए सूरज सबकी आयु कम करते हैं, सिवाय उसके जो सर्वश्रेष्ठ भगवान के गुणों का गुणगान करता है और अपना समय सदुपयोग करता है।
The rising and setting Sun reduces the lifespan of everyone, but the one who utilizes his time in discussing the stories of the Best God, his lifespan is not reduced.
तात्पर्य
यह पद्य अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन के उस महान महत्व की पुष्टि करता है कि भक्ति सेवा में तीव्रता लाते हुए सर्वोच्च प्रभु के साथ अपने खोए हुए संबंध को प्राप्त किया जाए। समय और ज्वार किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इसलिए सूर्योदय और सूर्यास्त द्वारा इंगित समय यदि आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए ठीक से उपयोग नहीं किए जाते तो वे व्यर्थ ही खराब हो जाएँगे। जीवन की अवधि का एक भाग भी जो व्यर्थ जाये वो सोने की किसी भी मात्रा से पूरा नहीं किया जा सकता। मानव जीवन एक जीव मात्र को बस इसलिए दिया गया है ताकि वो अपनी आध्यात्मिक पहचान और खुशियों के अपने स्थायी स्रोत को प्राप्त कर सके। एक जीवित प्राणी, विशेषकर मानव प्राणी, खुशियाँ ढूँढता है क्योंकि खुशी जीवित प्राणी की स्वाभाविक स्थिति है। लेकिन वो भौतिक वातावरण में व्यर्थ ही खुशियाँ ढूँढता रहता है। एक जीवित प्राणी संवैधानिक रूप से संपूर्ण पूर्णता की एक आध्यात्मिक चिंगारी है और उसकी खुशियाँ आध्यात्मिक गतिविधियों में ही समझी जा सकती हैं। प्रभु संपूर्ण आत्मा के संपूर्ण हैं और उनका नाम, रूप, गुण, लीलाएँ, सेवक और व्यक्तित्व सभी उनके ही समान हैं। एक बार जब एक व्यक्ति भक्ति सेवा के उचित माध्यम से ऊपर बताए गए प्रभु की किसी एक ऊर्जा के संपर्क में आता है तो पूर्णता का द्वार तुरंत खुल जाता है। भगवद् गीता (2:40) में प्रभु ने ऐसे संपर्क को निम्न शब्दों में विस्तृत किया है: "भक्ति सेवा में प्रयास कभी विफल नहीं होते। वहाँ कोई असफलता भी नहीं है। ऐसी गतिविधियों की एक छोटी शुरुआत भी एक व्यक्ति को भौतिक भय के विशाल समुद्र से मुक्त करने के लिए पर्याप्त है।" जिस तरह से नसों में लगाई गई एक अत्यधिक प्रभावी दवा पूरे शरीर पर एक बार में ही कार्य करती है, उसी प्रकार से प्रभु के शुद्ध भक्त द्वारा कान के माध्यम से सुनाए गए प्रभु के ट्रांसडेंडेंटल विषय भी बहुत ही प्रभावी रूप से कार्य कर सकते हैं। ट्रांसडेंडेंटल संदेशों का श्रवण-द्वारा प्राप्ति का मतलब है पूर्ण प्राप्ति, जिस प्रकार से एक पेड़ के किसी एक हिस्से का फल प्राप्त करने का मतलब है अन्य सभी हिस्सों के फल की प्राप्ति। शुकादेव गोस्वामी जैसे शुद्ध भक्तों के साथ एक पल के लिए भी प्राप्ति पूरे जीवन को सदा के लिए तैयार कर देती है। और इसलिए सूर्य शुद्ध भक्त से उसकी जीवन अवधि को नहीं चुरा पाता क्योंकि वो लगातार प्रभु की भक्ति सेवा में लगा रहता है, अपने अस्तित्व को शुद्ध करता रहता है। मृत्यु एक शाश्वत जीवित प्राणी के भौतिक संक्रमण का एक लक्षण है; सिर्फ भौतिक संक्रमण की वजह से ही एक शाश्वत जीवित प्राणी जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के नियमों के अधीन आ जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा उद्धृत स्मृति-शास्त्रों में दान जैसी धार्मिक गतिविधियों के भौतिकवादी तरीके की सिफ़ारिश की गई है। एक उपयुक्त व्यक्ति को दिए गए दान की राशि अगले जन्म में बैंक बैलेंस के रूप में मिलने की गारंटी है। यह अनुशंसा की जाती है कि ऐसे दान एक ब्राह्मण को दिए जाएँ। यदि दान की राशि किसी गैर ब्राह्मण को (ब्राह्मणिक योग्यता के बिना) दे दी जाती है तो दान की गई राशि अगले जन्म में उसी अनुपात में वापस मिलती है। यदि दान की राशि एक अधपढ़ ब्राह्मण को दे दी जाती है तो उस दान की राशि दुगुनी होकर वापस मिलती है। यदि दान की राशि किसी विद्वान और पूरी तरह से योग्य ब्राह्मण को दे दी जाती है तो उस दान की राशि सौ और एक हजार गुना होकर वापस मिलती है और यदि दान की राशि किसी वेद-पाराग (जिसने वास्तव में वेदों के मार्ग को प्राप्त किया हो) को दे दी जाती है तो उस दान की राशि का अनंत गुना होकर वापस मिलता है। वैदिक ज्ञान का अंतिम लक्ष्य भगवद् गीता में लिखे अनुसार भगवान कृष्ण के व्यक्तित्व, भगवान की प्राप्ति है (वेदैश्च सर्वैरहमेव वेध्या:)। दान में दी गई राशि की वापसी की गारंटी होती है, चाहे वह किसी भी अनुपात में ही क्यों न हो। इसी प्रकार, एक शुद्ध भक्त के संग में प्रभु के ट्रांसडेंडेंटल संदेशों को सुनते और जपते हुए बिताया गया एक पल भी शाश्वत जीवन की, भगवान के पास, अपने घर वापस लौटने की एक परिपूर्ण गारंटी है। माध धाम गत्वा पुनर् जन्म ना विद्यते। दूसरे शब्दों में कहें तो, प्रभु के भक्त को शाश्वत जीवन की गारंटी दी गई है। वर्तमान जीवन में भक्त का बुढ़ापा या बीमारी ऐसी गारंटीशुदा शाश्वत जीवन के लिए सिर्फ एक प्रेरणा है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥