स वै भागवतो राजा पाण्डवेयो महारथ: ।
बालक्रीडनकै: क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे ॥ १५ ॥
अनुवाद
पाण्डवों के नाती, महाराज परीक्षित बचपन से ही भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। खिलौनों से खेलते समय भी वो अपने कुलदेव की पूजा की नकल करके भगवान कृष्ण की पूजा किया करते थे।
Maharaja Parikshit, the grandson of the Pandavas, was a great devotee of the Lord since his childhood. Even while playing with toys, he used to worship Lord Krishna, imitating the worship of his family deity.
तात्पर्य
भगवद्गीता (6.41) में कहा गया है कि भले ही कोई व्यक्ति योग अभ्यास के उचित निर्वहन में विफल रहा हो, उसे भक्त ब्राह्मणों के घर या क्षेत्रिय राजाओं या धनी व्यापारियों जैसे धनी व्यक्तियों के घरों में जन्म लेने का मौका दिया जाता है। लेकिन महाराजा परीक्षित इससे कहीं अधिक थे क्योंकि वह अपने पिछले जन्म से ही भगवान के महान भक्त थे, और इस तरह उन्होंने कुरुओं के शाही परिवार में जन्म लिया, और विशेषकर पाण्डवों के परिवार में। इसलिए बचपन से ही उन्हें अपने परिवार में भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा को भली-भाँति जानने का मौका मिला। पाण्डव, जो सभी भगवान के भक्त थे, निश्चित रूप से पूजा के लिए शाही महल में पारिवारिक देवताओं की वंदना करते थे। ऐसे परिवारों में पैदा होने वाले बच्चे सौभाग्य से आमतौर पर बचपन के खेल के रास्ते में भी देवताओं की ऐसी पूजा का अनुकरण करते हैं। भगवान श्री कृष्ण की कृपा से, हमें एक वैष्णव परिवार में जन्म लेने का मौका मिला और हमारे बचपन में हमने अपने पिता का अनुकरण करके भगवान कृष्ण की पूजा का अनुकरण किया। रथ-यात्रा और डोला-यात्रा समारोह जैसे सभी कार्यों का पालन करने के लिए हमारे पिता ने हम सभी को प्रोत्साहित किया और वह हमें बच्चों और हमारे दोस्तों को प्रसाद वितरित करने के लिए उदारता से पैसा खर्च करते थे। हमारे आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने भी एक वैष्णव परिवार में जन्म लिया, अपने महान वैष्णव पिता ṭकाकुर भक्तिविनोद से सभी प्रेरणाएँ लीं। यह सभी भाग्यशाली वैष्णव परिवारों का तरीका है। प्रसिद्ध मीरा बाई भगवान कृष्ण की एक कट्टर भक्त थीं, जो गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले महान व्यक्ति थे। ऐसे कई भक्तों का जीवन इतिहास लगभग एक जैसा होता है क्योंकि भगवान के सभी महान भक्तों के प्रारंभिक जीवन में हमेशा समरूपता होती है। जीव गोस्वामी के अनुसार, महाराजा परीक्षित ने निश्चित रूप से वृंदावन में भगवान कृष्ण के बचपन के समय के बारे में सुना होगा, क्योंकि वह अपने युवा साथियों के साथ उस समय का अनुकरण करते थे। श्रीधर स्वामी के अनुसार, महाराजा परीक्षित परिवार के देवता की पूजा का अनुकरण बुजुर्ग सदस्यों द्वारा करते थे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती भी जीव गोस्वामी के दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। इसलिए उनमें से किसी को भी स्वीकार करते हुए, महाराजा परीक्षित स्वाभाविक रूप से बचपन से ही भगवान कृष्ण की ओर झुकाव रखते थे। उन्होंने ऊपर बताई गई गतिविधियों में से किसी एक का अनुकरण किया होगा, और वे सभी उनके महान भक्ति को उनके बचपन से ही स्थापित करते हैं, जो कि महान भागवत का लक्षण है। ऐसे महान भागवतों को नित्य-सिद्ध या जन्म से मुक्त आत्माएँ कहा जाता है। लेकिन कुछ अन्य भी हैं, जो जन्म से मुक्त नहीं हो सकते हैं, लेकिन जो संगति द्वारा भक्ति सेवा की प्रवृत्ति विकसित करते हैं, और उन्हें साधना-सिद्ध कहा जाता है। अंतिम मुद्दे में दोनों में कोई अंतर नहीं है, और इसलिए निष्कर्ष यह है कि हर कोई शुद्ध भक्तों के साथ संगति करके एक साधना-सिद्ध, भगवान का भक्त बन सकता है। ठोस उदाहरण हमारे महान आध्यात्मिक गुरु श्री नारद मुनि हैं। अपने पिछले जीवन में वह केवल एक दासी का लड़का था, लेकिन महान भक्तों के साथ संगति के माध्यम से वह अपने स्वयं के मानक का भगवान का भक्त बन गया, जो भक्ति सेवा के इतिहास में अद्वितीय है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥