श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.3.14 
एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोऽर्हसि भाषितुम् ।
कथा हरिकथोदर्का: सतां स्यु: सदसि ध्रुवम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे विद्वान सूत गोस्वामी, आप हम सबको ऐसी कथाएँ सुनाते रहें क्योंकि हम सुनने के बहुत इच्छुक हैं। इसके अलावा, ऐसी कथाएँ जिनसे भगवान हरि के विषय में विचार-विमर्श हो, भक्तों की सभा में अवश्य ही कही जानी चाहिए।
 
O learned Suta Goswami, please keep explaining such stories to all of us, as we are eager to listen to them. Besides, such stories which can lead to discussions on Lord Hari must be told and heard in the assembly of devotees.
तात्पर्य
जैसा कि हमने पहले ही रूप गोस्वामी के भक्ति-रसामृत-सिंधु से उद्धृत किया है, सांसारिक चीजें भी, अगर भगवान श्री कृष्ण की सेवा में डुबो दी जाएं, तो पारलौकिक मानी जाती हैं। उदाहरण के लिए, रामायण और महाभारत के महाकाव्य या इतिहास, जो विशेष रूप से कम बुद्धिमान वर्गों (महिलाओं, शूद्रों और उच्च जाति के अयोग्य पुत्रों) के लिए अनुशंसित हैं, उन्हें भी वैदिक साहित्य के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि वे भगवान की गतिविधियों के संबंध में संकलित हैं। महाभारत को वेदों के पांचवें भाग के रूप में स्वीकार किया जाता है, इसके पहले चार भागों, अर्थात् साम, यजुर, ऋग और अथर्व के बाद। अल्प बुद्धिमान महाभारत को वेदों का हिस्सा नहीं मानते, लेकिन महान ऋषि और अधिकारी इसे वेदों का पांचवां भाग मानते हैं। भगवद-गीता भी महाभारत का हिस्सा है, और यह कम बुद्धिमान वर्ग के लोगों के लिए भगवान के निर्देशों से भरी हुई है। कुछ कम बुद्धिमान लोग कहते हैं कि भगवद-गीता गृहस्थों के लिए नहीं है, लेकिन ऐसे मूर्ख लोग भूल जाते हैं कि भगवद-गीता को अर्जुन, एक गृहस्थ (परिवार के व्यक्ति) को समझाया गया था, और भगवान ने एक गृहस्थ के रूप में अपनी भूमिका में बोला था। इसलिए भगवद-गीता, यद्यपि वैदिक ज्ञान का उच्च दर्शन समाहित किए हुए है, लेकिन यह पारलौकिक विज्ञान में शुरुआती लोगों के लिए है, और श्रीमद-भागवतम पारलौकिक विज्ञान में स्नातकों और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए है। इसलिए महाभारत, पुराण और इसी तरह के अन्य साहित्य जो भगवान के पाश्चात्य काल से भरे हुए हैं, सभी पारलौकिक साहित्य हैं, और उन पर महान भक्तों के समाज में पूरे विश्वास के साथ चर्चा की जानी चाहिए।

कठिनाई यह है कि ऐसे साहित्य, जब पेशेवर लोगों द्वारा चर्चा की जाती है, तो इतिहास या महाकाव्यों की तरह सांसारिक साहित्य प्रतीत होते हैं क्योंकि इसमें बहुत सारे ऐतिहासिक तथ्य और आंकड़े होते हैं। इसलिए, यहाँ कहा गया है कि इस तरह के साहित्य पर भक्तों की सभा में चर्चा की जानी चाहिए। जब तक भक्तों द्वारा चर्चा नहीं की जाती, ऐसे साहित्य का आनंद उच्च वर्ग के पुरुषों द्वारा नहीं लिया जा सकता है। तो निष्कर्ष यह है कि प्रभु अंततः अवैयक्तिक नहीं हैं। वह सर्वोच्च पुरुष हैं, और उनकी अलग-अलग गतिविधियाँ हैं। वह सभी जीवित प्राणियों के नेता हैं, और वह अपनी इच्छा से और अपनी व्यक्तिगत ऊर्जा से पतित आत्माओं को फिर से प्राप्त करने के लिए उतरते हैं। इस प्रकार वह बिल्कुल सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक नेताओं की तरह खेलते हैं। क्योंकि ऐसी भूमिकाएँ अंततः भगवान के विषयों की चर्चा में परिणत होती हैं, इसलिए ऐसे सभी प्रारंभिक विषय भी पारलौकिक हैं। यही मानव समाज की नागरिक गतिविधियों को आध्यात्मिक बनाने का तरीका है। इतिहास और कई अन्य सांसारिक साहित्य - कहानियाँ, कथाएँ, नाटक, पत्रिकाएँ, समाचार पत्र आदि - का अध्ययन करने के लिए लोगों का झुकाव होता है। इसलिए उन्हें भगवान की पारलौकिक सेवा से जोड़ा जाए, और वे सभी उन विषयों में बदल जाएँगे जिनका आनंद सभी भक्त लेते हैं। यह प्रचार कि भगवान अवैयक्तिक हैं, उनकी कोई गतिविधि नहीं है और वह बिना किसी नाम और रूप के मूक पत्थर हैं, ने लोगों को ईश्वरविहीन, विश्वासहीन राक्षस बनने के लिए प्रोत्साहित किया है, और जितना अधिक वे भगवान की पारलौकिक गतिविधियों से विचलित होते हैं, उतना ही अधिक वे सांसारिक गतिविधियों के आदी हो जाते हैं जो ईश्वर के पास लौटने के बजाय नर्क को ही अपना रास्ता साफ कर देती हैं।* श्रीमद-भागवतम पाण्डवों के इतिहास (आवश्यक राजनीति और सामाजिक गतिविधियों के साथ) से शुरू होता है, और फिर भी श्रीमद-भागवतम को परमहंस-संहिता या सर्वोच्च पारलौकिकतावादी के लिए वैदिक साहित्य कहा जाता है, और यह परम ज्ञान, सर्वोच्च पारलौकिक ज्ञान का वर्णन करता है। भगवान के शुद्ध भक्त सभी परमहंस हैं, और वे हंसों की तरह हैं, जो दूध और पानी के मिश्रण से दूध चूसने की कला जानते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)