कठिनाई यह है कि ऐसे साहित्य, जब पेशेवर लोगों द्वारा चर्चा की जाती है, तो इतिहास या महाकाव्यों की तरह सांसारिक साहित्य प्रतीत होते हैं क्योंकि इसमें बहुत सारे ऐतिहासिक तथ्य और आंकड़े होते हैं। इसलिए, यहाँ कहा गया है कि इस तरह के साहित्य पर भक्तों की सभा में चर्चा की जानी चाहिए। जब तक भक्तों द्वारा चर्चा नहीं की जाती, ऐसे साहित्य का आनंद उच्च वर्ग के पुरुषों द्वारा नहीं लिया जा सकता है। तो निष्कर्ष यह है कि प्रभु अंततः अवैयक्तिक नहीं हैं। वह सर्वोच्च पुरुष हैं, और उनकी अलग-अलग गतिविधियाँ हैं। वह सभी जीवित प्राणियों के नेता हैं, और वह अपनी इच्छा से और अपनी व्यक्तिगत ऊर्जा से पतित आत्माओं को फिर से प्राप्त करने के लिए उतरते हैं। इस प्रकार वह बिल्कुल सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक नेताओं की तरह खेलते हैं। क्योंकि ऐसी भूमिकाएँ अंततः भगवान के विषयों की चर्चा में परिणत होती हैं, इसलिए ऐसे सभी प्रारंभिक विषय भी पारलौकिक हैं। यही मानव समाज की नागरिक गतिविधियों को आध्यात्मिक बनाने का तरीका है। इतिहास और कई अन्य सांसारिक साहित्य - कहानियाँ, कथाएँ, नाटक, पत्रिकाएँ, समाचार पत्र आदि - का अध्ययन करने के लिए लोगों का झुकाव होता है। इसलिए उन्हें भगवान की पारलौकिक सेवा से जोड़ा जाए, और वे सभी उन विषयों में बदल जाएँगे जिनका आनंद सभी भक्त लेते हैं। यह प्रचार कि भगवान अवैयक्तिक हैं, उनकी कोई गतिविधि नहीं है और वह बिना किसी नाम और रूप के मूक पत्थर हैं, ने लोगों को ईश्वरविहीन, विश्वासहीन राक्षस बनने के लिए प्रोत्साहित किया है, और जितना अधिक वे भगवान की पारलौकिक गतिविधियों से विचलित होते हैं, उतना ही अधिक वे सांसारिक गतिविधियों के आदी हो जाते हैं जो ईश्वर के पास लौटने के बजाय नर्क को ही अपना रास्ता साफ कर देती हैं।* श्रीमद-भागवतम पाण्डवों के इतिहास (आवश्यक राजनीति और सामाजिक गतिविधियों के साथ) से शुरू होता है, और फिर भी श्रीमद-भागवतम को परमहंस-संहिता या सर्वोच्च पारलौकिकतावादी के लिए वैदिक साहित्य कहा जाता है, और यह परम ज्ञान, सर्वोच्च पारलौकिक ज्ञान का वर्णन करता है। भगवान के शुद्ध भक्त सभी परमहंस हैं, और वे हंसों की तरह हैं, जो दूध और पानी के मिश्रण से दूध चूसने की कला जानते हैं।
