ज्ञानं यदाप्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र -
मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्ग: ।
कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोग:
को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥
अनुवाद
भौतिक गुणों के उतार-चढ़ाव और भँवरों को पूरी तरह से रोकने वाला ज्ञान भगवान हरि से संबंधित पारलौकिक ज्ञान है। भौतिक आसक्ति से रहित होने के कारण ऐसा ज्ञान आत्म-संतुष्टि प्रदान करता है और पारलौकिक होने के कारण इसे महापुरुषों द्वारा स्वीकृति मिली है। तो ऐसा कौन है जो इससे आकर्षित न हो?
The divine knowledge of Lord Hari is that knowledge which completely stops the waves and whirlpools of material modes. Such knowledge is self-satisfying because it is devoid of material attachment and is accepted by great men because it is divine. So who is there who will not be attracted by it?
तात्पर्य
भगवद् गीता (10.9) के अनुसार शुद्ध भक्तों के लक्षण अद्भुत होते हैं। एक शुद्ध भक्त की संपूर्ण क्रियात्मक गतिविधियाँ हमेशा भगवान की सेवा में संलग्न रहती हैं, और इस प्रकार शुद्ध भक्त अपनी आपस में आनंद की भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं और आध्यात्मिक आनंद का स्वाद लेते हैं। यदि किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में उचित रूप से किया जाए तो यह आध्यात्मिक आनंद भक्तिमय अभ्यास (साधना अवस्था) की अवस्था में भी अनुभव किया जाता है। और परिपक्व अवस्था में विकसित आध्यात्मिक भावना उस प्रभु के साथ विशेष संबंध की प्राप्ति में परिणत हो जाती है जिसके द्वारा एक जीव मूल रूप से गठित होता है (प्रभु के साथ दांपत्य प्रेम के संबंध तक, जिसे उच्चतम आध्यात्मिक आनंद माना जाता है)। इस प्रकार भक्ति योग, ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र साधन होने के कारण कैवल्य कहलाता है। श्रील जीवा गोस्वामी ने इस संबंध में वैदिक संस्करण ( एको नारायणो देवः , परावराणां परम आस्ते कैवल्य-संज्ञितः ) का उद्धरण दिया है और यह स्थापित किया है कि नारायण, भगवान का व्यक्तित्व, कैवल्य के रूप में जाना जाता है, और जो साधन किसी को प्रभु के पास जाने में सक्षम बनाता है उसे कैवल्य-पंथा कहा जाता है, या भगवान की प्राप्ति का एकमात्र साधन। यह कैवल्य पंथा श्रवण से शुरू होता है, या उन विषयों को सुनता है जो भगवान के व्यक्तित्व से संबंधित हैं, और इस तरह के हरि कथा को सुनने का स्वाभाविक परिणाम आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति है, जिससे सभी सांसारिक विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है, जिसके लिए एक भक्त में कोई रुचि नहीं होती। एक भक्त के लिए, सभी सांसारिक गतिविधियाँ, सामाजिक और राजनीतिक, अनुपयुक्त हो जाती हैं, और परिपक्व अवस्था में ऐसा भक्त अपने शरीर में भी अरुचि हो जाती है, और शारीरिक संबंधियों की तो बात ही छोड़िए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति भौतिक अवस्थाओं की लहरों से उत्तेजित नहीं होता है। भौतिक प्रकृति के विभिन्न तरीके हैं, और सभी सांसारिक कार्य जिनमें एक आम आदमी बहुत रुचि रखता है या जिसमें वह भाग लेता है, भक्त के लिए अनुपयुक्त हो जाता है। इस स्थिति को यहाँ प्रति निवृत्त-गुणोर्मी के रूप में वर्णित किया गया है, और यह आत्म-प्रसाद, या किसी भी भौतिक संबंध के बिना पूर्ण आत्म-संतुष्टि से संभव है। भगवान का प्रथम श्रेणी का भक्त भक्ति सेवा द्वारा इस अवस्था को प्राप्त करता है, लेकिन अपनी महानता के बावजूद, भगवान की संतुष्टि के लिए वह भगवान की महिमा के प्रचारक की स्वैच्छिक भूमिका निभा सकता है और सभी को भक्ति सेवा में समेटा सकता है, भौतिक रुचि तक, सिर्फ नौसिखियों को मौका देने के लिए। सांसारिक रुचि को आध्यात्मिक आनंद में बदलना। श्रील रूप गोस्वामी ने शुद्ध भक्त की इस क्रिया को निर्बन्धः कृष्ण-सम्बन्धे युक्तं वैराग्यं उच्यते के रूप में वर्णित किया है। यहाँ तक कि भगवान की सेवा से जुड़ी सांसारिक गतिविधियों को भी पारलौकिक या अनुमोदित कैवल्य मामलों के रूप में गणना की जाती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥