यांति देव-व्रता देवान
पितृन् यांति पितृ-व्रताः
भूतानि यांति भूतेज्या
यांति मद्-याजिनोऽपि माम्
"देवताओं के उपासक संबंधित देवताओं के ग्रहों पर पहुंचते हैं, और पूर्वजों के उपासक पूर्वजों के ग्रहों पर पहुंचते हैं। स्थूल भौतिकवादी विभिन्न भौतिक ग्रहों में रहता है, लेकिन प्रभु के भक्त परमेश्वर के राज्य में पहुंचते हैं।"
हमारे पास भगवद् गीता से यह जानकारी भी है कि भौतिक जगत के भीतर ब्रह्मलोक सहित सभी ग्रह, अस्थायी रूप से स्थित हैं, और एक निश्चित अवधि के बाद वे सभी नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि प्रलय के समय सभी देवता और उनके अनुयायी नष्ट हो जाते हैं, लेकिन जो वो ईश्वर के राज्य को प्राप्त कर लेता है उसे अनंत जीवन में एक स्थायी हिस्सा मिल जाता है। वैदिक साहित्य का यही निर्णय है। ईश्वरीय जगत के उपासकों को अविश्वासियों की तुलना में एक अतिरिक्त सुविधा होती है क्योंकि वे वैदिक संस्करण से आश्वस्त होते हैं, जिसके द्वारा उन्हें भगवान के भक्तों की संगति में सर्वोच्च भगवान की पूजा करने के लाभों की जानकारी मिल सकती है। हालाँकि, स्थूल भौतिकवादी वैदिक संस्करण में बिना किसी विश्वास के, हमेशा अंधेरे में रहता है, अपूर्ण प्रायोगिक ज्ञान या तथाकथित भौतिक विज्ञान के आधार पर एक झूठे विश्वास से प्रेरित होता है, जो कभी भी पारलौकिक ज्ञान के क्षेत्र तक नहीं पहुँच सकता।इसलिए जब तक स्थूल भौतिकवादी या अस्थायी देवताओं के उपासक भगवान के शुद्ध भक्त जैसे किसी पारलौकिक व्यक्ति के संपर्क में नहीं आते, तब तक उनके प्रयास केवल ऊर्जा की बर्बादी हैं। केवल दिव्य व्यक्तित्वों की कृपा से, भगवान के शुद्ध भक्त, कोई शुद्ध भक्ति प्राप्त कर सकता है, जो मानव जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है। केवल भगवान का शुद्ध भक्त ही किसी को प्रगतिशील जीवन का सही मार्ग दिखा सकता है। अन्यथा भौतिकवादी जीवन शैली, भगवान या देवताओं की किसी भी जानकारी के बिना, और देवताओं की पूजा में लगा हुआ जीवन, अस्थायी भौतिक सुख की खोज में, मनोविकृति के विभिन्न चरण हैं। भगवद् गीता में भी इसे अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन भगवद् गीता केवल शुद्ध भक्तों की संगति में ही समझी जा सकती है, राजनेताओं या शुष्क दार्शनिक सट्टेबाजों की व्याख्याओं से नहीं।
