श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.3.10 
अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी: ।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
अपनी बुद्धि का विस्तार करने वाले व्यक्ति को, चाहे वह भौतिक इच्छाओं से भरा हो, बिना भौतिक इच्छाओं में फंसे हो या मुक्ति की इच्छा रखता हो, उसे सभी प्रकार से पूर्ण ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।
 
A person who has a broad intelligence, whether he is selfish or selfless or desirous of liberation, should worship the Supreme Lord in all ways.
तात्पर्य
भगवद्-गीता में भगवान श्री कृष्ण को पुरुषोत्तम या सर्वोच्च देवता के रूप में वर्णित किया गया है। केवल वही हैं जो ऐसे आकांक्षियों को भगवान की देह से निकलने वाली किरण ब्रह्मज्योति में विलीन करके मुक्ति प्रदान कर सकते हैं। ब्रह्मज्योति भगवान से अलग नहीं है, जैसे सूर्य की तेजस्वी किरणें सूर्य की डिस्क से स्वतंत्र नहीं होती हैं। इसलिए जो लोग सर्वोच्च निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन होना चाहते हैं, उन्हें भी भगवान की भक्ति-योग द्वारा पूजा करनी चाहिए, जैसा कि श्रीमद-भागवतम में यहाँ अनुशंसित किया गया है। यहाँ विशेष रूप से भक्ति-योग को सभी पूर्णताओं के साधन के रूप में बल दिया गया है। पिछले अध्यायों में यह कहा गया है कि भक्ति-योग कर्म-योग और ज्ञान-योग दोनों का अंतिम लक्ष्य है, और इसी तरह इस अध्याय में इस बात पर जोर दिया गया है कि विभिन्न देवताओं की विभिन्न प्रकार की पूजाओं का अंतिम लक्ष्य भक्ति-योग है। इस प्रकार, भक्ति-योग आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च साधन है, इसलिए यहाँ इसकी अनुशंसा की जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भक्ति-योग की विधियों को गंभीरता से अपनाना चाहिए, भले ही वह भौतिक सुख या भौतिक बंधन से मुक्ति की आकांक्षा रखता हो।

अकाम वह है जिसकी कोई भौतिक इच्छा नहीं होती है। एक जीव, स्वाभाविक रूप से सर्वोच्च पूर्ण पुरुषपुरुषम पूर्णं का अभिन्न अंग होने के नाते, सर्वोच्च सत्ता की सेवा करना उसका स्वाभाविक कार्य है, जैसे शरीर के अंग या शरीर के अंग स्वाभाविक रूप से पूरे शरीर की सेवा करने के लिए होते हैं। इसलिए इच्छारहित होने का अर्थ पत्थर की तरह निष्क्रिय होना नहीं है, बल्कि अपनी वास्तविक स्थिति के प्रति जागरूक होना है और इस प्रकार केवल सर्वोच्च भगवान से संतुष्टि की इच्छा रखना है। श्रील जीव गोस्वामी ने अपने संदर्भ में इस इच्छारहितता को भजनीय-परम-पुरुष-सुख-मात्र-स्व-सुखत्वम के रूप में समझाया है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति को केवल सर्वोच्च भगवान की सुखानुभूति का अनुभव करके ही सुख का अनुभव करना चाहिए। जीव की यह अंतर्ज्ञान कभी-कभी भौतिक दुनिया में एक जीव की वातानुकूलित अवस्था के दौरान भी प्रकट होती है, और इस तरह की अंतर्ज्ञान कम बुद्धिमान व्यक्तियों के अविकसित दिमाग द्वारा परोपकारिता, परोपकार, समाजवाद, साम्यवाद आदि के रूप में व्यक्त की जाती है। सांसारिक क्षेत्र में समाज, समुदाय, परिवार, देश या मानवता के रूप में दूसरों का भला करने की ऐसी सोच उसी मूल भावना की आंशिक अभिव्यक्ति है जिसमें एक शुद्ध जीव सर्वोच्च भगवान की खुशी से खुशी महसूस करता है। भगवान की खुशी के लिए व्रजभूमि की अप्सराओं ने ऐसी शानदार भावनाएं प्रदर्शित कीं। गोपियाँ बिना किसी प्रतिदान के भगवान से प्यार करती थीं, और यह अकामः भावना की उत्तम प्रदर्शनी है। काम भावना या अपनी संतुष्टि की इच्छा भौतिक दुनिया में पूरी तरह से प्रदर्शित होती है, जबकि अकामः भावना आध्यात्मिक दुनिया में पूरी तरह से प्रदर्शित होती है। भगवान के साथ एक होने या ब्रह्मज्योति में विलीन होने के विचार भी काम भावना की अभिव्यक्ति हो सकते हैं यदि वे भौतिक दुखों से मुक्त होने के लिए अपनी संतुष्टि की इच्छा रखते हैं। एक शुद्ध भक्त मुक्ति नहीं चाहता है ताकि उसे जीवन के दुखों से मुक्ति मिल सके। बिना तथाकथित मुक्ति के भी, एक शुद्ध भक्त भगवान की संतुष्टि के लिए आकांक्षी होता है। काम भावना से प्रभावित होकर, अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में लड़ने से इनकार कर दिया क्योंकि वह अपने संबंधियों को अपनी संतुष्टि के लिए बचाना चाहता था। लेकिन एक शुद्ध भक्त होने के नाते, वह भगवान के निर्देश पर लड़ने के लिए सहमत हो गया क्योंकि वह होश में आया और उसने महसूस किया कि अपनी संतुष्टि की कीमत पर भगवान की संतुष्टि उसका प्रमुख कर्तव्य था। इस प्रकार वह अकाम बन गया। यही एक पूर्ण जीव की पूर्ण अवस्था है।

उदार-धीः का अर्थ है जिसका दृष्टिकोण विस्तृत हो। भौतिक भोगों की इच्छा रखने वाले लोग छोटे देवताओं की पूजा करते हैं, और ऐसी बुद्धि को भगवद्-गीता (7.20) में हृता-ज्ञान के रूप में निंदा की गई है, उस व्यक्ति की बुद्धि जिसने अपनी इंद्रियों को खो दिया है। कोई भी व्यक्ति सर्वोच्च भगवान की स्वीकृति प्राप्त किए बिना देवताओं से कोई भी परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए एक व्यापक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति यह देख सकता है कि भौतिक लाभों के लिए भी परम अधिकार भगवान का ही है। परिस्थितियों में, भौतिक भोग या मुक्ति की इच्छा रखने वाला एक व्यापक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति को प्रभु की पूजा सीधे करनी चाहिए। और प्रत्येक व्यक्ति, चाहे अकाम हो या सकम या मोक्ष-काम हो, उसे भगवान की पूजा बड़ी शीघ्रता से करनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि भक्ति-योग को कर्म और ज्ञान के किसी मिश्रण के बिना पूरी तरह से प्रशासित किया जा सकता है। जैसे अमिश्रित सूर्य की किरण बहुत बलवान होती है और इसलिए तीव्र कहलाती है, वैसे ही सुनना, जप करना आदि की अमिश्रित भक्ति-योग सभी द्वारा किया जा सकता है, चाहे उनका आंतरिक उद्देश्य कुछ भी हो।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)