श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.10.6 
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मन: सह शक्तिभि: ।
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
महाविष्णु की रहस्यमयी शयन अवस्था के दौरान जीवों का अपनी परिस्थितिजन्य जीवन प्रवृत्तियों के साथ उनमें विलय होना ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की समाप्ति कहलाता है। परिवर्तनशील स्थूल और सूक्ष्म भौतिक शरीरों को छोड़ने के बाद जीव के रूप की स्थायी स्थिति ‘मुक्ति’ है।
 
The soul's going to sleep with its life-related tendencies of the conditioned state and getting absorbed in Maha Vishnu is called the dissolution of the manifest universe. The permanent state of the soul's form after leaving the changing gross and subtle bodies is 'Mukti'.
तात्पर्य
जैसा कि हमने कई बार चर्चा की है, दो प्रकार के जीवित प्राणी हैं। उनमें से अधिकांश सदैव मुक्त या नित्य-मुक्त हैं, जबकि कुछ सदैव सशर्त हैं। सदा के सशर्त आत्मा भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व की मानसिकता विकसित करने के लिए उपयुक्त हैं, और इसलिए भौतिक ब्रह्मांडीय सृजन सदा के सशर्त आत्माओं को दो प्रकार की सुविधाएँ देने के लिए प्रकट होता है। एक सुविधा यह है कि सशर्त आत्मा ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति पर प्रभुता करने की अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कार्य कर सकता है, और दूसरी सुविधा सशर्त आत्मा को भगवान के पास वापस आने का मौका देती है। इसलिए ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के समाप्त होने के बाद, अधिकांश सशर्त आत्माएं भगवान महा विष्णु के व्यक्तित्व में विलय हो जाती हैं, जो उनकी रहस्यमय नींद में पड़े रहते हैं, अगले सृजन में फिर से बनाए जाने के लिए। लेकिन कुछ सशर्त आत्माएं, जो वैदिक साहित्य के रूप में पारलौकिक ध्वनि का पालन करती हैं और इस प्रकार भगवान के पास वापस जाने में सक्षम होती हैं, सशर्त स्थूल और सूक्ष्म भौतिक शरीरों को छोड़ने के बाद आध्यात्मिक और मूल शरीर प्राप्त करती हैं। भगवान के साथ अपने संबंध को भूल जाने पर जीवित संस्थाओं से भौतिक सशर्त शरीर विकसित होते हैं, और ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के दौरान, सशर्त आत्माओं को अपने जीवन की मूल स्थिति को पुनर्जीवित करने का मौका दिया जाता है, जो प्रकट शास्त्रों की मदद से होता है, जिन्हें भगवान ने अपने विभिन्न अवतारों में दयापूर्वक संकलित किया है। ऐसे पारलौकिक साहित्य को पढ़ने या सुनने से भौतिक अस्तित्व की सशर्त स्थिति में भी मुक्त होने में मदद मिलती है। सभी वैदिक साहित्य भगवान के व्यक्तित्व के लिए भक्ति सेवा का लक्ष्य रखते हैं, और जैसे ही व्यक्ति इस बिंदु पर निश्चित हो जाता है, वह तुरंत सशर्त जीवन से मुक्त हो जाता है। भौतिक स्थूल और सूक्ष्म रूप केवल सशर्त आत्मा के अज्ञान के कारण होते हैं और जैसे ही वह भगवान की भक्ति सेवा में निश्चित हो जाता है, वह सशर्त अवस्था से मुक्त होने के योग्य हो जाता है। यह भक्ति सेवा सर्वोच्च के प्रति पारलौकिक आकर्षण है क्योंकि वह सभी सुखद हास्य का स्रोत है। हर कोई आनंद के लिए कुछ हास्य के पीछे है, लेकिन सभी आकर्षणों (रसो वै सः रसम ह्येवायं लब्ध्वानंदी भवति) के सर्वोच्च स्रोत को नहीं जानता है। वैदिक मंत्र सभी को सभी सुखों के सर्वोच्च स्रोत के बारे में बताते हैं: सभी सुखों का असीमित स्रोत भगवान का व्यक्तित्व है। और जो इस भाग्यशाली है कि वह श्रीमद-भागवतम जैसे पारलौकिक साहित्य के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त करता है वह भगवान के राज्य में अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए स्थायी रूप से मुक्त हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)