श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.10.6 
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मन: सह शक्तिभि: ।
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
महाविष्णु की रहस्यमयी शयन अवस्था के दौरान जीवों का अपनी परिस्थितिजन्य जीवन प्रवृत्तियों के साथ उनमें विलय होना ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की समाप्ति कहलाता है। परिवर्तनशील स्थूल और सूक्ष्म भौतिक शरीरों को छोड़ने के बाद जीव के रूप की स्थायी स्थिति ‘मुक्ति’ है।
 
महाविष्णु की रहस्यमयी शयन अवस्था के दौरान जीवों का अपनी परिस्थितिजन्य जीवन प्रवृत्तियों के साथ उनमें विलय होना ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की समाप्ति कहलाता है। परिवर्तनशील स्थूल और सूक्ष्म भौतिक शरीरों को छोड़ने के बाद जीव के रूप की स्थायी स्थिति ‘मुक्ति’ है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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